ब्राह्मण युवा का मूक आक्रोश: योग्यता का शिकार और लोकतंत्र की काली विडंबना..
▪️भारतवर्ष के इस विशाल लोकतंत्र में, जहाँ संविधान की पावन भूमि पर “समता” और “न्याय” के स्वर गूँजते थे, आज एक गहन पीड़ा व्याप्त है। वह पीड़ा सामान्य वर्ग की है, विशेषकर ब्राह्मण समाज की, जो सदियों से ज्ञान-विज्ञान की ज्योति जलाई, गुरु की भूमिका निभाई, किन्तु आज अपने ही देश में “सामान्य” कहकर उपेक्षित कर दिया गया है। न आरक्षण का सहारा, न वोट-बैंक की राजनीति का आशीर्वाद। केवल निश्छल परिश्रम और मेरिट का दीपक, जो आरक्षण की काली छाया में बुझाया जा रहा है।
▪️कल्पना कीजिए एक ब्राह्मण युवक की। रात-रात भर जागकर, पितृ-ऋण चुकाते हुए, NEET की कठिन परीक्षा में उसने ६५० अंक प्राप्त किए। उसकी योग्यता स्वर्णिम थी, उसका सपना चिकित्सा का पवित्र क्षेत्र सँवारने का था। किन्तु आरक्षण की जंजीर ने उसे पीछे धकेल दिया। वहीं, मात्र ४१० अंक (अर्थात माइनस ४० अंकों की दूरी पर) पाने वाला अभ्यर्थी, आरक्षण के बल पर डॉक्टर बन गया। जबरदस्ती! हाँ, जबरदस्ती। समाज को यह स्वीकार करना पड़ा कि रोगी की जान, जीवन-मरण का फैसला अब उस हाथ में सौंपा जा रहा है, जिसने परीक्षा में ही अपनी अक्षमता सिद्ध कर दी। क्या यह योग्यता का अपमान नहीं? क्या यह राष्ट्र की प्रगति का गला घोंटना नहीं?
▪️ब्राह्मण समाज, जो कभी “विद्या का पुजारी” कहलाता था, आज राजनीति की दौड़ में “अदृश्य” हो गया है। कोई दल उसे अपना प्रतिनिधि नहीं मानता, क्योंकि वह वोट-बैंक नहीं बनाता। उसके नेता जनसेवक होते हुए भी मालिक बन बैठे हैं। पाँच वर्ष के लिए चुने गए ये “सेवक” सामान्य वर्ग के कल्याण की योजनाएँ बनाने के बजाय उसके विरुद्ध खड़े हो जाते हैं। शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा—हर क्षेत्र में मेरिट को कुचला जा रहा है। इंजीनियरिंग के द्वार, प्रशासन की राहें, विज्ञान की ऊँचाइयाँ—सब आरक्षण की दीवार से टकरा रही हैं।
▪️यह हनन केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय क्षति है। जब योग्यतम युवा को पीछे धकेल दिया जाता है, तो चिकित्सा का स्तर गिरता है, अनुसंधान रुक जाता है, राष्ट्र की आत्मा क्षीण हो जाती है। ब्राह्मण युवा का आँसू चुपचाप बहता है, क्योंकि वह राजनीति नहीं करता, वोट-बैंक नहीं बनाता। वह केवल पढ़ता है, मेहनत करता है और आशा रखता है। किन्तु आज की सत्ता-लोलुप राजनीति ने उसे “बिना अधिकार” का पात्र बना दिया है।
▪️समय आ गया है कि इस अन्याय को आवाज़ दी जाए। सामान्य वर्ग—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—सभी को एकजुट होकर कहना होगा: “हम मेरिट चाहते हैं, आरक्षण नहीं। हम योग्यता चाहते हैं, जबरदस्ती नहीं।” पाँच वर्ष के लिए चुने गए नेता जनसेवक हैं, मालिक नहीं। वे सामान्य जन के हित में योजनाएँ लाएँ, अन्यथा इतिहास उन्हें “योग्यता के हननकर्ता” के रूप में याद रखेगा।
ब्राह्मण युवा की यह पीड़ा एक दिन राष्ट्र-चेतना बन जाएगी। योग्यता अमर हो। अन्याय का अंत हो।
— एक चिन्तित सामान्य वर्ग का नागरिक
✍️“ब्रजेश कुमार त्रिवेदी”