जल एवं मृदा संरक्षण हेतु शैक्षणिक भ्रमण
पन्ना जिला मध्य प्रदेश
पहला गांव – शहपुरा (ब्लॉक शाहनगर)
भ्रमण का पहला पड़ाव शहपुरा गांव था, जो एक पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है। यहाँ पहुँचकर स्थानीय किसानों के साथ सामूहिक चर्चा की गई। चर्चा के दौरान यह जानकारी सामने आई कि पहाड़ के आसपास लगभग 2 किलोमीटर के क्षेत्र की भूमि असिंचित थी, जिसमें कोई किसानों खेती नही करते थे।
इस समस्या के समाधान के लिए PSI संस्था ने पहाड़ से निकलने वाले प्राकृतिक नाले में ही जहां नमी दिखाई दी, वहाँ लगभग 10 डोभा (दोहा) का निर्माण करवाया। इन डोभों के माध्यम से पानी को रोककर आसपास की जमीन में सीचने और नमी बनाए रखने का प्रयास किया गया।
इन संरचनाओं के निर्माण के बाद लगभग 20 किसानों की करीब 25 हेक्टेयर जमीन सिंचित होने लगी। वहाँ के किसान निर्भय और गनपत ने बताया कि पहले वर्ष में उन्हें खेती से बीज का खर्च भी नही निकला, लेकिन इस वर्ष में उन्होंने डेढ़ से दो लाख रुपये तक का उत्पादन प्राप्त किया है।
डोभों का निर्माण नाले के प्राकृतिक बहाव को ध्यान में रखते हुए किया गया था। एक डोभा की सामान्य संरचना लगभग 3 मीटर लंबाई, 1 से 1.5 मीटर चौड़ाई तथा 1 मीटर गहराई की थी। इन डोभों के माध्यम से किसान धान, गेहूं, सरसों, उड़द तथा विभिन्न प्रकार की साग-सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं।
दूसरा गांव – मटीयानला
इसके बाद भ्रमण दल मटीयानला गांव पहुँचा, जहाँ PSI संस्था द्वारा जल संरक्षण के लिए एक 80 मीटर लंबा मिट्टी का बांध बनाया गया है। इस बांध की निचली सतह की चौड़ाई लगभग 7 मीटर तथा ऊपरी भाग की चौड़ाई लगभग 3 मीटर है।
इस बांध के निर्माण के लिए सबसे पहले 80 मीटर लंबी, 1 मीटर गहरी तथा 3 मीटर चौड़ी नाली खोदी गई। इसके बाद इस नाली को चिकनी मिट्टी से भरा गया और हर 3 फीट की परत पर मशीन से अच्छी तरह दबाकर मजबूत बनाया गया। इस तकनीक से निर्मित बांध वर्षा के पानी को रोकने और भूजल स्तर को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
तीसरा गांव – सिल्हेटी
तीसरे स्थान पर भ्रमण दल सिल्हेटी गांव पहुँचा, जहाँ किसान करण सिंह मरकाम से मुलाकात हुई। चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि PSI संस्था के मार्गदर्शन से वे 2 एकड़ भूमि में 100% शुद्ध जैविक खेती कर रहे हैं।
वे अपनी जमीन में चना, मटर, गेहूं, धान तथा विभिन्न प्रकार की सब्जियों का उत्पादन करते हैं। इन उत्पादों को वे थोक में बेचने के बजाय स्वयं टिकरी और शाहनगर के बाजार में बैठकर सीधे ग्राहकों को बेचते हैं, जिससे उन्हें बेहतर मूल्य मिलता है। इस प्रकार सभी खर्च निकालने के बाद उन्हें लगभग 5,000 से 8,000 रुपये प्रति माह की आय प्राप्त हो जाती है।
चौथा गांव – शाहपुर खुर्द
इसके बाद भ्रमण दल शाहपुर खुर्द गांव पहुँचा, जहाँ कविता दीदी से मुलाकात हुई। उन्होंने महिलाओं के सहयोग से एक जैविक बीज बैंक की स्थापना की है। यह बीज बैंक महिलाओं के स्वयं सहायता समूह द्वारा संचालित किया जाता है।
इस व्यवस्था के अंतर्गत समूह की महिलाएँ अपने घरों में उपलब्ध विभिन्न प्रकार के बीज लाकर बैंक में जमा करती हैं। मौसम आने पर समूह की महिलाओं को आवश्यकतानुसार निःशुल्क बीज उपलब्ध कराए जाते हैं। जो महिलाएँ बीज जमा नहीं कर पातीं, उन्हें बीज नाममात्र शुल्क पर उपलब्ध कराया जाता है।
इसके अतिरिक्त कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा खेती से संबंधित विभिन्न कार्यों जैसे निराई, गुड़ाई, रोपाई, कटाई, कीटनाशक छिड़काव तथा जैविक खाद निर्माण के लिए आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं। इन उपकरणों को समूह द्वारा प्रति दिन के किराये के आधार पर किसानों को उपयोग हेतु दिया जाता है।
गांव के लगभग प्रत्येक घर में घरेलू पोषण बाड़ी (किचन गार्डन) भी विकसित की गई है, जिसमें पपीता, नींबू, मिर्च, गाजर, धनिया, पालक, मेथी, टमाटर, प्याज और लहसुन जैसी सब्जियों का जैविक तरीके से उत्पादन किया जा रहा है।
पांचवां गांव – जनगना (उमरिया)
इसके बाद भ्रमण दल जनगना (उमरिया) गांव पहुँचा, जहाँ पुनः डोभा निर्माण की संरचनाओं को देखा और उनके कार्य करने की प्रक्रिया को विस्तार से समझा गया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि छोटे-छोटे जल संरक्षण उपाय भी ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।
यह शैक्षणिक भ्रमण अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक रहा। इस भ्रमण के माध्यम से जल एवं मृदा संरक्षण, छोटे जल संरचनाओं के महत्व, जैविक खेती के प्रभावी मॉडल, बीज संरक्षण तथा सामुदायिक सहभागिता के उत्कृष्ट उदाहरण देखने और समझने को मिले।