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बीस वर्षों से थमा माचिस का दाम, अब अस्तित्व की लड़ाई में उद्योग—दो हफ्ते की तालाबंदी से संकट गहराया


• पांच लाख रोजगारों पर मंडराया खतरा
• कच्चे माल की कीमतों में बेतहाशा उछाल, लेकिन उत्पाद का दाम जस का तस
• 12 से 25 अप्रैल तक देशभर में तालाबंदी, आम जनजीवन पर पड़ेगा असर
शाहगंज/जौनपुर।
रोजमर्रा की जिंदगी का छोटा-सा लेकिन बेहद जरूरी हिस्सा—माचिस—आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रहा है। बीते बीस वर्षों से माचिस की कीमत जहां ₹1 पर स्थिर है, वहीं कच्चे माल की लागत आसमान छू रही है। इस असंतुलन ने पूरे माचिस उद्योग को संकट के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि उद्योग से जुड़े लगभग पांच लाख श्रमिकों की आजीविका पर खतरा मंडराने लगा है।
नगर पहुंचे माचिस उद्योग के प्रमुख निर्माता लिबर्टी मैच कम्पनी प्राइवेट लिमिटेड के महाप्रबंधक के. एम्ब्रोस ने चिंता जताते हुए बताया कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बहाने कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता लगातार कीमतें बढ़ा रहे हैं। नतीजा यह है कि निर्माता आवश्यक सामग्री खरीदने में असमर्थ होते जा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि पहले से ही बाजार में सिगरेट लाइटरों की बढ़ती मांग, जीएसटी रिटर्न में देरी से पूंजी का फंसना और अब युद्ध के कारण शिपिंग सेवाओं पर असर—इन सबने उद्योग की कमर तोड़ दी है। निर्यात पूरी तरह ठप पड़ा है, जिससे हजारों लोगों के सामने बेरोजगारी का संकट खड़ा हो गया है।
₹1400 करोड़ का कारोबार, फिर भी संकट में उद्योग
देश का माचिस उद्योग हर वर्ष करीब ₹800 करोड़ का घरेलू और ₹600 करोड़ का अंतरराष्ट्रीय व्यापार करता है। कुल मिलाकर यह उद्योग लगभग ₹1400 करोड़ का कारोबार संभालता है और करीब 5 लाख लोगों को रोजगार देता है। तमिलनाडु के तूतीकोरिन, विरुधुनगर, तेनकासी, धर्मपुरी, कृष्णागिरि, वेल्लोर और गुडियाथम जैसे जिलों में यह पिछले एक सदी से जीवनरेखा बना हुआ है।
लेकिन विडंबना यह है कि जहां हर वस्तु के दाम बढ़े, वहीं माचिस आज भी ₹1 में बिक रही है। चीनी लाइटरों और उनके सस्ते विकल्पों ने बाजार में माचिस की मांग को लगातार कम किया है।
कच्चे माल में भारी उछाल ने बढ़ाई चिंता
उद्योगपतियों के अनुसार कच्चे माल की कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है—
वैक्स: ₹80 से बढ़कर ₹165 प्रति किलो
सल्फर: ₹26 से ₹81 प्रति किलो
फॉस्फोरस: ₹605 से ₹646 प्रति किलो
पोटैशियम डाइक्रोमेट: ₹276 से ₹345 प्रति किलो
बीओपीपी रील: ₹168 से ₹250 प्रति किलो
रोसिन: ₹118 से ₹158 प्रति किलो
कार्टन बॉक्स: ₹2.50 प्रति पीस तक महंगे
इसके अलावा अन्य सामग्री में भी लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उद्योग का आरोप है कि कई थोक व्यापारी कृत्रिम कमी (हॉर्डिंग) पैदा कर कीमतें बढ़ा रहे हैं।
तालाबंदी का ऐलान, फैक्ट्रियां रहेंगी बंद
स्थिति से परेशान होकर कोविलपट्टी, सत्तूर और शिवकाशी के उद्योग संगठनों ने संयुक्त रूप से 12 अप्रैल से 25 अप्रैल तक तालाबंदी का निर्णय लिया है। इस दौरान सभी फैक्ट्रियां बंद रहेंगी, जिससे बाजार में माचिस की आपूर्ति प्रभावित होना तय है।
शाहगंज बना आपूर्ति का बड़ा केंद्र
शाहगंज में हर माह करीब 25 से 30 हजार पेटी माचिस पहुंचती है। यहां से जौनपुर, आजमगढ़, भदोही, अंबेडकरनगर, वाराणसी, मऊ और सुल्तानपुर तक आपूर्ति होती है। क्षेत्र में चमेली, किसान, पूजा और धनुष ब्रांड की माचिस खास तौर पर बिकती है।
तमिलनाडु से करीब 2500 किलोमीटर की दूरी तय कर आने वाले ट्रकों का किराया लगभग डेढ़ लाख रुपये पड़ता है। एक ट्रक को यहां पहुंचने में करीब एक सप्ताह लगता है।
आम आदमी पर भी पड़ेगा असर
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो माचिस जैसी जरूरी वस्तु बाजार से गायब हो सकती है। इसका सीधा असर आम जनजीवन पर पड़ेगा—चूल्हे से लेकर पूजा-पाठ तक हर जगह इसकी कमी महसूस होगी।
सरकार से गुहार
उद्योगपतियों ने सरकार और प्रशासन से मांग की है कि कच्चे माल की कृत्रिम कमी रोकने, जमाखोरी पर कार्रवाई करने और उचित मूल्य निर्धारण सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं।
अब देखना यह है कि क्या समय रहते इस संकट का समाधान निकल पाता है, या फिर रोजमर्रा की यह छोटी-सी डिब्बी आने वाले दिनों में आम लोगों के लिए बड़ी चिंता बन जाएगी।

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Comment
  • Hamraj Singh Chouhan

    माननीय महोदय ये क्या हो रहा है 543 से बढ़ाकर 850 लोकसभा सीट करने का संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत* देश की जनता पर नया बोझ है ओर कुछ नहीं इनके पेंशन और भत्ते आपसे एक सवाल है में नियमित कर्मी की बात नहीं कर रहा उस कर्मी की जिसके लिए किसी ने कुछ नहीं किया केवल चिकित्सा विभाग का एक कैडर ANM GNM LT LA and pharmacist को छोड़कर बाकी शायद किसी को नियमित किया हो किसी भी विभाग में खुद इसी विभाग के प्रबंधकीय संविदा कार्मिक NHM को आज तक लटका कर रख दिया है उपरोक्त कैडर की किस्मत देखो बिना एग्जाम के परमानेंट नौकरी मिल जाती है क्या ये बेरोजगार के मुंह पर तमाचा नहीं जो दिन रात एक करके नौकरी लगता ओर इनमें से एक कैडर बिना एग्जाम के 4200 ग्रेड की नौकरी कैसा संविधान है भारत का एक संविदा कर्मी वह कभी नहीं चाहेगा कि वो सरकार की किसी फ्री योजना का लाभ ले लेकिन मजबूर है क्या करे यदि सरकार इनकी भी अच्छी सैलरी दे ओर समय से नियमित करे तो तो इनका भी भला हो जाएगा ये केवल अच्छी नौकरी की बात कर रहे है किसी सुख सुविधा की नहीं जैसे हवाई जहाज का टिकिट किसी फाइव स्टार होटल में फ्री रुकने का टिकिट किसी इंसेंटिव की बात नहीं कर रहे विडंबना ये है सरकार ये कहती हे कि परमानेंट कर्मी काम नहीं करता इसलिए इनकी सेवा के काम के लिए संविदा कर्मी रखती है में कहता हु सरकार तो आपके हाथ में है आपके अधिकारी से रिपोर्ट मांगे कौन समय से ड्यूटी कर रहा कौन ड्यूटी पर होने के बावजूद ड्यूटी पर नहीं है कौन गांव में काम नहीं करना चाहता उसकी पूरी जानकारी सबके पास होती है लेकिन किसी पर कोई एक्शन नहीं होता यहां तक कि अब सरकार govt department में योजना लाती ओर जिस परमानेंट कर्मी की सैलरी ऑलरेडी अच्छी है उसको सरकार मोबाइल का रिचार्ज वर्दी सिलवाने धुलवाने और भी बहुत से इंसेंटिव होते है क्या इन कर्मी के पास इन काम के पैसे नहीं बचते जो सरकार अलग से काम करवाने के लिए खर्चा देती है ओर एक तरफ संविदा कर्मी जिससे सारे काम करवा लेंगे लेकिन न तो सैलरी टाइम पर आती है न किसी प्रकार से कोई इंसेंटिव ये नहीं चाहते इंसेंटिव ये केवल इतना चाहते है समय से नियमित नियुक्ति जैसे चिकित्सा विभाग के anm gnm LT LA pharmacist को किया जाता है न तो इनकी फ्यूचर की सिक्योरिटी न वर्तमान की न पेंशन न सैलरी किसी की कोई गारंटी नहीं अगर सभी संविदा कर्मी ओर बेरोजगार भाई मेरी बात से सहमत है तो इसको हर जगह पहुंचा दो