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कृष्ण ने शर्त रखी कि राजा और रानी अपने पुत्र को आरी से काटकर सिंह को देंगे और उनकी आँखों में एक भी आंसू नहीं आना चाहिए...

कृष्ण ने शर्त रखी कि राजा और रानी अपने पुत्र को आरी से काटकर सिंह को देंगे और उनकी आँखों में एक भी आंसू नहीं आना चाहिए...

महाभारत युद्ध के बाद, जब महाराज युधिष्ठिर ने अश्वमेघ यज्ञ किया, तो यज्ञ का घोड़ा रतनपुर राज्य पहुँचा, जहाँ राजा मोरध्वज के छह वर्षीय पुत्र तांब्रध्वज ने उसे पकड़ लिया। अर्जुन ने बालक को घोड़ा छोड़ने को कहा, लेकिन तांब्रध्वज ने युद्ध की चुनौती दी। अर्जुन ने बालक पर ऐसे बाण चलाए जिससे उसे चोट न पहुंचे, लेकिन बालक ने उन्हें काट दिया। अंततः, तांब्रध्वज ने अर्जुन को मूर्छित कर घोड़ा ले गया।

होश में आने पर अर्जुन को बहुत आश्चर्य हुआ कि एक बालक ने उन्हें हरा दिया। वे तुरंत श्री कृष्ण के पास गए और क्षमा मांगते हुए कहा कि यह सब उनके अहंकार को तोड़ने के लिए ही किया गया है। कृष्ण ने उन्हें समझाते हुए कहा कि सच्ची भक्ति शरणागति में है, और जो भगवान में पूर्ण रूप से शरणागत है, वही सबसे बड़ा भक्त है।

फिर कृष्ण ने अर्जुन को भक्ति का पाठ पढ़ाने के लिए साधु का रूप धारण किया और एक सिंह के साथ मोरध्वज के पास पहुंचे। राजा ने उनकी सेवा करनी चाही, तो कृष्ण ने कहा कि उनका सिंह केवल मनुष्य का मांस खाता है। मोरध्वज स्वयं को प्रस्तुत करने लगे, लेकिन कृष्ण ने कहा कि उनका सिंह केवल छोटे बालकों का मांस खाता है और उनके पुत्र को भोजन बनाना होगा। अर्जुन को यह सुनकर दुख हुआ, लेकिन मोरध्वज ने कहा कि भगवान की आज्ञा सर्वोपरि है।

कृष्ण ने शर्त रखी कि राजा और रानी अपने पुत्र को आरी से काटकर सिंह को देंगे और उनकी आँखों में एक भी आंसू नहीं आना चाहिए। पुत्र भी इस परीक्षा के लिए सहर्ष तैयार था। राजा और रानी ने अपने पुत्र पर आरी चलाई, और अर्जुन को यह देखकर गहरा आघात लगा कि उनकी भक्ति मोरध्वज के सामने कितनी कम है। रानी की आँखों में आंसू आ गए, जिस पर कृष्ण ने कारण पूछा। रानी ने कहा कि उनका पुत्र भाग्यहीन था क्योंकि सिंह ने उसका केवल एक भाग ही खाया।

अर्जुन को समझ में आ गया कि पूर्ण शरणागति का मतलब क्या है। श्री कृष्ण समझ गए कि अर्जुन को भक्ति का पाठ मिल गया है, तो उन्होंने राजकुमार को आवाज लगाई, और राजकुमार तुरंत अपनी माता से लिपट गया। राजा और रानी ने महात्मा से परिचय पूछा, तब श्री कृष्ण ने उन्हें अपने चतुर्भुज रूप के दर्शन द*कृष्ण ने शर्त रखी कि राजा और रानी अपने पुत्र को आरी से काटकर सिंह को देंगे और उनकी आँखों में एक भी आंसू नहीं आना चाहिए

महाभारत युद्ध के बाद, जब महाराज युधिष्ठिर ने अश्वमेघ यज्ञ किया, तो यज्ञ का घोड़ा रतनपुर राज्य पहुँचा, जहाँ राजा मोरध्वज के छह वर्षीय पुत्र तांब्रध्वज ने उसे पकड़ लिया। अर्जुन ने बालक को घोड़ा छोड़ने को कहा,

लेकिन तांब्रध्वज ने युद्ध की चुनौती दी। अर्जुन ने बालक पर ऐसे बाण चलाए जिससे उसे चोट न पहुंचे, लेकिन बालक ने उन्हें काट दिया। अंततः, तांब्रध्वज ने अर्जुन को मूर्छित कर घोड़ा ले गया।

होश में आने पर अर्जुन को बहुत आश्चर्य हुआ कि एक बालक ने उन्हें हरा दिया। वे तुरंत श्री कृष्ण के पास गए और क्षमा मांगते हुए कहा कि यह सब उनके अहंकार को तोड़ने के लिए ही किया गया है। कृष्ण ने उन्हें समझाते हुए कहा कि सच्ची भक्ति शरणागति में है, और जो भगवान में पूर्ण रूप से शरणागत है, वही सबसे बड़ा भक्त है।

फिर कृष्ण ने अर्जुन को भक्ति का पाठ पढ़ाने के लिए साधु का रूप धारण किया और एक सिंह के साथ मोरध्वज के पास पहुंचे। राजा ने उनकी सेवा करनी चाही, तो कृष्ण ने कहा कि उनका सिंह केवल मनुष्य का मांस खाता है।

मोरध्वज स्वयं को प्रस्तुत करने लगे, लेकिन कृष्ण ने कहा कि उनका सिंह केवल छोटे बालकों का मांस खाता है और उनके पुत्र को भोजन बनाना होगा। अर्जुन को यह सुनकर दुख हुआ, लेकिन मोरध्वज ने कहा कि भगवान की आज्ञा सर्वोपरि है।

कृष्ण ने शर्त रखी कि राजा और रानी अपने पुत्र को आरी से काटकर सिंह को देंगे और उनकी आँखों में एक भी आंसू नहीं आना चाहिए। पुत्र भी इस परीक्षा के लिए सहर्ष तैयार था।

राजा और रानी ने अपने पुत्र पर आरी चलाई, और अर्जुन को यह देखकर गहरा आघात लगा कि उनकी भक्ति मोरध्वज के सामने कितनी कम है। रानी की आँखों में आंसू आ गए, जिस पर कृष्ण ने कारण पूछा। रानी ने कहा कि उनका पुत्र भाग्यहीन था क्योंकि सिंह ने उसका केवल एक भाग ही खाया।

अर्जुन को समझ में आ गया कि पूर्ण शरणागति का मतलब क्या है। श्री कृष्ण समझ गए कि अर्जुन को भक्ति का पाठ मिल गया है, तो उन्होंने राजकुमार को आवाज लगाई, और राजकुमार तुरंत अपनी माता से लिपट गया। राजा और रानी ने महात्मा से परिचय पूछा, तब श्री कृष्ण ने उन्हें अपने चतुर्भुज रूप के दर्शन दिए।

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