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गर्मी से राहत पाने का देसी, मटकों का बाजार फिर से हुआ गुलजार, लेकिन कुम्भकारो की मुश्किलें बढ़ीं गर्मी की तपिश में मटके में की ठंडक और बढ़ती चुनौती

*गर्मी से राहत पाने का देसी तरीका, मटकों का बाजार फिर से हुआ गुलजार, लेकिन कुम्भकारो की मुश्किलें बढ़ीं*
*गर्मी की तपिश में मटके की ठंडक और बढ़ती चुनौती*
खैरथल हीरालाल भूरानी
पिछले कुछ दिनों से अचानक बढ़ी गर्मी ने खैरथल में लोगों राहत की दिनचर्या को प्रभावित कर दिया है, लेकिन इसी गर्मी के बीच एक पुरानी परंपरा ने वापसी की है। मटके, जो कभी गांवों और शहरों के घरों का अहम हिस्सा हुआ करते थे, अब एक बार फिर लोगों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। बाजार और सड़कों के किनारे सजे मिट्टी के मटके न केवल ठंडक दे रहे हैं, बल्कि पुरानी यादों को भी ताजा कर रहे हैं।
आजकल के प्रदूषित वातावरण और गर्मी के बीच, लोग अब फिज के ठंडे पानी के बजाय मटके के प्राकृतिक पानी को तरजीह दे रहे हैं। मटके का पानी न केवल शारीरिक ठंडक प्रदान करता है, बल्कि यह सेहत के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। मटके के अंदर रखा पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता है, जिससे यह शरीर को ताजगी और सुकून प्रदान करता है।
इस बार बाजार में पारंपरिक मटकों के साथ-साथ नए डिजाइन के मिट्टी के कैम्पर और बोतलें भी उपलब्ध हैं, जो आधुनिक जरूरतों के अनुरूप तैयार की गई हैं।
दुकानदारों का कहना है कि बढ़ती गर्मी के चलते मटकों की मांग तेजी से बढ़ी है और लोग इन्हें बड़े पैमाने पर खरीद रहे हैं। प्लास्टिक की बोतलें और इलैक्ट्रिक उपकरणों के मुकाबले मटके का पानी न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि यह आर्गेनिक जल की अवधारणा को भी बढ़ावा दे रहा है। स्थानीय लोग मानते हैं कि मटके का पानी पीने से प्यास जल्दी बुझती है और शरीर को ठंडक मिलती है, जिससे अब हर घर में मटकों की वापसी हो रही है।
*उत्पादन में बढ़ी लागत, मुनाफा घटा*
हालांकि, इस बढ़ती मांग के बीच कुम्भकारों के लिए मुश्किलें भी बढ़ी हैं। कुंभकार धर्मेंद्र प्रजापत ने बताया कि मटके बनाने में अब लगभग 70 रुपए की लागत आती है, जबकि बाजार में यह 100 रुपए में बिकता है। बढ़ती कच्चा माल और ईंधन की कीमतों ने उत्पादन लागत को बढ़ा दिया है, जबकि मटके के दाम में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हो पा रही है। इससे मुनाफा घटता जा रहा है, और कुम्भकारों को मुश्किलें आने लगी हैं। इस बढ़ती लागत और घटते मुनाफे के बावजूद, मटके का महत्व और मांग दिनों-दिन बढ़ती जा रही है, और यह हमारे पुरानी परंपरा को सहेजने का एक बेहतरीन तरीका बन चुका है।
*फोटो कैप्शन -- गर्मी में मटके की ठंडक, खैरथल में सड़क किनारे परंपरा की वापसी*

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