औलिया मस्जिद .ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी और बाबा फरीद ने एक साथ नमाज़ अदा की थी। Mahrauli
यह माना जाता है कि सुल्तान इल्तुतमिश ने ख़्वाजा क़ुतुब की दरगाह के पास औलिया मस्जिद बनवाई थी, लेकिन आज जो इमारत मौजूद है वह लगभग चार सौ साल से ज़्यादा पुरानी नहीं मानी जाती। पुरानी मस्जिद का मूल ढांचा अब मौजूद नहीं है, बस कुछ पत्थर की स्लैब्स ही उस दौर की याद दिलाती हैं।
मस्जिद के सहन में एक कुआँ भी है, जिसके पास सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। कहा जाता है कि पहले ये सीढ़ियाँ सीधे हौज़-ए-शम्सी तक जाती थीं।
औलिया मस्जिद को ख़ास मुकाम इसलिए मिला क्योंकि यहाँ यह मशहूर मान्यता है कि ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी और बाबा फरीद ने एक साथ नमाज़ अदा की थी। बाबा फरीद अकेले ऐसे चिश्ती बुज़ुर्ग हैं जिन्हें अपने उस्ताद ख़्वाजा क़ुतुब और उनके उस्ताद ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती—दोनों से मुलाक़ात और दुआ प्राप्त करने का शरफ़ हासिल हुआ।
आज भी मस्जिद में तीन पत्थर की स्लैब्स मौजूद हैं, जिन्हें उस जगह की निशानी माना जाता है जहाँ इन तीनों सूफ़ी बुज़ुर्गों ने क़याम करके नमाज़ पढ़ी थी। लोग आज भी बड़ी अकीदत से उन स्लैब्स पर बैठकर दुआ करते हैं और मानते हैं कि उन जगहों पर बरकत और रूहानी फ़ैज़ मौजूद है।