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भारत को पहचाने। भारत के उस शक्ति के जाने, जो विश्व में कही नहीं।


वैसे देखा जाय तो बहुत सारे देश इस दुनिया में भारत से धनी है और सम्पन्न भी है लेकिन भारत के पास वो धरोहर है जिसको विश्व के हर नागरिक और हर देश अगर इसको गहराइयों से जांचे परखे और अपने जीवन में उतारे तो यह कहना अत्योशोक्ति नहीं होगी की "सत्य क्या है" यह पहेली पहेली नहीं रहेगी और सत्य का खोज भारतीय संस्कृति के जानने से समाप्त हो जायेगी और मनुष्य ये समझने में कामयाब होगा की जिस सत्य की खोज मैं कर रहा हूं वो वास्तव में "मैं ही हूं " इसलिए भारत की आस्था की ऊंचाइयों को अगर विश्व जानना चाहता है तो भारत के संस्कृत से समझने, बुझने, जानने और महसूस करने का विचार मन में लाना होगा। क्योंकि भारत की संस्कृत एकमात्र ऐसी संस्कृति है जिसने "सत्य" को किसी एक पुस्तक या पद्धति में कैद नहीं किया, बल्कि उसे हर कण में खोजा। इसलिए भारत की आस्था महान इसलिए है क्योंकि यह 'समावेशी' है। हमने कभी ये नहीं कहा कि "मेरा रास्ता ही सही है," हमने कहा— "एको सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (सत्य एक है, विद्वान उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं)। इसलिए भारत को पहचानना केवल उसके भूगोल को समझना नहीं, बल्कि उस 'चेतना' को महसूस करना है जो हज़ारों वर्षों से अविचल बह रही है। इसलिए दुनिया के अधिकांश धर्म जहां (विश्वास) पर टिके हैं, वहीं पर भारत की सनातन परंपरा (अनुभव) पर आधारित है। इसलिए ​अद्वैत का विज्ञान के माध्यम से जहाँ दुनिया द्वैत (मै और भगवान अलग हैं) में फँसी है, भारत का 'अद्वैत' कहता है, 'अहम् ब्रह्मास्मि' (मैं ही ब्रह्म हूँ)। यह विचार मनुष्य को उस दासता से मुक्त कर उसे अनंत की शक्ति देता है। इतनाही नहीं भारत ने दुनिया को केवल '0' का अंक नहीं दिया, बल्कि 'शून्य' का दर्शन दिया। बुद्ध और शंकर ने सिखाया कि जब विचार शून्य होते हैं, तभी पूर्णता का जन्म होता है। आज की 'क्वांटम भौतिकी' के कई सिद्धांत उपनिषदों के इसी 'शून्य' और 'अनंत' के मेल से मेल खाते हैं। इसलिए दुनिया संस्कृत को केवल एक पुरानी भाषा मानती है, लेकिन यह वास्तव में चेतना का 'ऑप्टिमाइज़्ड सॉफ्टवेयर' है। इसलिए संस्कृत के मंत्रों का उच्चारण 'जीभ' के विशिष्ट बिंदुओं को स्पर्श करता है, जो सीधे मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को सक्रिय करते हैं। यह दुनिया की एकमात्र ऐसी भाषा है जिसमें शब्दों का क्रम बदलने पर भी अर्थ नहीं बदलता, जो इसे कंप्यूटर प्रोग्रामिंग और भविष्य के क्वांटम कम्प्यूटिंग के लिए सबसे सटीक ढांचा प्रदान करती है। इसलिए ढाई हज़ार साल पहले पाणिनी ने व्याकरण के जो 3,959 सूत्र लिखे थे, वे आधुनिक कंप्यूटर साइंस के 'बैकस-नौर फॉर्म' (BNF) के पूर्वज के रूप में आज भी सही और माने जाते हैं। इसलिए भारत को समझना एक भौगोलिक मानचित्र को देखने जैसा नहीं है, बल्कि एक ऐसे 'ऊर्जा पुंज' का अनुभव करना है जिसने समय की हर कसौटी पर खुद को सिद्ध किया है। इसलिए आज की दुनिया जिसे 'ब्रांडिंग' या 'विजुअल कम्युनिकेशन' कहती है, भारत ने उसे सदियों पहले 'मुद्राओं' और 'चिन्हों' के माध्यम से यह सिद्ध कर लिया था कि विज्ञापन और प्रतीकवाद 'दृश्य' के पीछे का दर्शन है और इसी के माध्यम से भारत ने ​प्रतीक की शक्ति के रूप में भारत का सबसे प्राचीन 'विज्ञापन' 'ॐ' है। इसलिए "ॐ" शब्द वो दैविक वाणी है जिससे न केवल आपका रोम रोम शुद्ध होता है बल्कि दुनिया में व्याप्त जितने भी अच्छाइया है सबको इस साधना से प्राप्त कर सकते हैं जिससे आत्म शांति की अनुभूति होगी। इसलिए इसके नियम को समझते हुए , "ॐ" के पांच मिनट का उच्चारण से एक अजीब सा आपके शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा जो आपको दिन भर तरोताजा और स्वस्थ महसूस कराता रहेगा। इसके अनेक फायदे हैं बिस्तर से मैं बताऊंगा तो लेख लंबा होगा। इसलिए आधुनिक विज्ञान अब यह स्वीकार कर रहा है कि यह केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की मौलिक आवृत्ति है। इतनाही नहीं ​अशाब्दिक संचार के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय नृत्यों में प्रयोग होने वाली 'मुद्राएं' दुनिया का सबसे जटिल संचार तंत्र हैं। बिना एक शब्द बोले, केवल हाथों के संकेतों से पूरी रामायण या महाभारत कह देना, यह दर्शाता है कि हमारी अभिव्यक्ति कितनी सूक्ष्म और गहरी रही है। इसलिए दुनिया संस्कृत को एक मृत या केवल पूजा-पाठ की भाषा मानती है, लेकिन इसके गहरे तथ्य चौंकाने वाले तथ्य हैं क्योंकि इसके गणितीय शुद्धता के माध्यम से संस्कृत दुनिया की एकमात्र 'ध्वन्यात्मक' भाषा है, जैसा लिखा जाता है, वैसा ही बोला जाता है। इसलिए नासा के शोध बताते हैं कि आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस (AI) और एल्गोरिदम के लिए संस्कृत सबसे उपयुक्त भाषा है क्योंकि इसका व्याकरण पूरी तरह से गणितीय नियमों पर आधारित है। तथा मंत्र विज्ञान संस्कृत के अक्षरों का उच्चारण शरीर के 'चक्रों' और तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करता है। यह भाषा 'सूचना' देने के लिए नहीं, बल्कि 'रूपांतरण' के लिए रची गई थी। इसलिए पश्चिम विज्ञान और खगोलशास्त्र जो आधुनिकता से प्राचीनतम काल के रहस्यों को अब खोज पाया है वे भारतीय ग्रंथों ने उन्हें हज़ारों साल पहले 'साधारण सत्य' की तरह दर्ज किया था। इसलिए जहाँ पश्चिम, कुछ हज़ार साल पुरानी सृष्टि की बात करता था या कर रहा है, वही पर भारत ने 'कल्प' और 'युग' की गणना सदियों पहले कर दी और इसके तहत बताया कि एक 'कल्प' (ब्रह्मा का दिन) लगभग 4.32 अरब वर्ष का होता है, जो आधुनिक विज्ञान द्वारा बताई गई पृथ्वी की आयु के आश्चर्यजनक रूप से करीब है। इतनाही नहीं ​गुरुत्वाकर्षण और गति के बारे में भास्कराचार्य ने न्यूटन से सैकड़ों वर्ष पहले 'सिद्धांत शिरोमणि' में पृथ्वी की आकर्षण शक्ति (गुरुत्वाकर्षण) का वर्णन किया था। इसके सूक्ष्म संकेत ऋग्वेद के मंत्रों में प्रकाश की गति और पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर परिक्रमा का सूक्ष्म संकेत मिलता है।
इसलिए भारत ने दुनिया को धर्म(संप्रदाय) नहीं, बल्कि 'धर्म' (दिया, जिसका अर्थ है 'धारण करने योग्य नियम'। इसलिए ​शून्य का आध्यात्मिक और गणितीय अर्थ से भारत ने दुनिया को केवल '0' की संख्या नहीं दी, बल्कि 'शून्य' की स्थिति बताई। गणित में शून्य का अर्थ है 'कुछ नहीं', लेकिन आध्यात्म में शून्य का अर्थ है 'पूर्णता'। यह वह बिंदु है जहाँ पहुँचकर मनुष्य ब्रह्मांड से जुड़ जाता है। और इसी के साथ दूसरा मूर्ति विज्ञान दिया जो विदेशी दृष्टि में यह 'बुतपरस्ती' है, लेकिन भारतीय विज्ञान में यह 'यंत्र' है। प्रत्येक मूर्ति की बनावट, हाथ की मुद्रा और उसके पीछे की धातु एक विशिष्ट फ्रीक्वेंसी पैदा करने के लिए डिज़ाइन की गई है, जो ध्यान लगाने वाले के मनोविज्ञान पर गहरा प्रभाव डालती है। इसलिए दुनिया से अनभिज्ञ भारत के गहरे तथ्य यह है कि ​प्लास्टिक सर्जरी और आयुर्वेद आज के युग में आम बात है वही पर महर्षि सुश्रुत को दुनिया आज 'सर्जरी का जनक' मान रही है। जिन्होंने 2600 साल पहले मोतियाबिंद, पथरी और यहाँ तक कि 'राइनोप्लास्टी' (नाक की सर्जरी) की प्रक्रियाएं लिखी थीं, जो आज भी चिकित्सा विज्ञान का आधार हैं। यही नहीं ​वास्तु और ऊर्जा प्रवाह से भारतीय मंदिरों में केवल ईंट-पत्थर के ढांचे नहीं हैं। बल्कि वे 'जियोडेसिक' सिद्धांतों पर बने हैं। जो दक्षिण भारत के कई मंदिर पृथ्वी की चुंबकीय रेखाओं के जंक्शन पर स्थित हैं, जो व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।
इसलिए भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाएं केवल वर्तमान मानचित्र तक सीमित नहीं थीं, बल्कि यह एक 'सांस्कृतिक महाद्वीप' था जिसे प्राचीन काल में 'वृहत्तर भारत' के नाम से जाना जाता था। इसलिए भारत की गरिमा किसी साम्राज्य विस्तार की लालसा में नहीं, बल्कि "सर्वे भवन्तु सुखिनः" (सभी सुखी हों) के उदार भाव में है। हमारे महापुरुषों ने दुनिया को सिखाया कि श्रेष्ठ वह नहीं जो दूसरों को झुका दे, बल्कि श्रेष्ठ वह है जो गिरते हुए को उठा ले। यही वह 'सूझबूझ' है जो भारत को विश्व पटल पर पुनः एक दैदीप्यमान नक्षत्र के रूप में स्थापित करती है। भारत की आस्था इसलिए ऊँची है क्योंकि हमने कभी 'तलवार' के दम पर अपने विचार नहीं थोपे। हमने 'योग' दिया जो शरीर को जोड़ता है, 'वेदांत' दिया जो मन को जोड़ता है, और 'संस्कृत' दी जो बुद्धि को तराशती है। ​इसलिए जब विश्व 'पर्यावरण संकट' या 'मानसिक तनाव' से जूझता है, तो भारत का "वसुधैव कुटुंबकम" (पूरी पृथ्वी एक परिवार है) और "अहिंसा परमो धर्म:" का विचार ही एकमात्र समाधान बनकर उभरता है। इसलिए भारत वह प्रकाश है जो दुनिया को बाहर नहीं, बल्कि अपने 'भीतर' झाँकने के लिए प्रेरित करता है।
इसलिए भारत और भारत की संस्कृत, धर्म, विज्ञान और सभ्यता पर दूर दूर कोई कारण नहीं बचता की इसको कोसा जाय और भारत के आस्था पर सवाल किया जाय बशर्ते भारत को गहराई से पढ़ना समझना और इससे सिख लेने की जरूरत है जिससे सब जन को एक दिशा मिले और एक सुंदर विश्व की स्थापना हो सके।
इसलिए भारतीय संस्कृत, धर्म, सभ्यता और संस्कार के दिलों की मूल अच्छाइया है जिसको गहन अध्ययन कर के अपने अंदर के व्याप्त बुराइयों को दूर कर के आत्म शुद्धि से परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं और एक योग्य महापुरुष बन सकते हैं।
सप्रेम धन्यवाद
🙏❤️🌹🎉

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