संयम पथ के राही - दीक्षार्थी संजय भैया बने मुनि 108 श्री सामायिक सागर जी
"धन्य है वह कूल, धन्य है वह माता-पिता ...जिनके घर त्याग और वैराग्य की अमृत धारा बहती है।"
परतापुर : वागड़ की पावन धरा (परतापुर) के गौरव , मुमुक्षु संजय भैया अब "स्व" से "सर्वस्व " की ओर कदम बढ़ा रहे है।
त्याग,तपस्या और वैराग्य की प्रतिमूर्ति बनकर वे अब" जीव से जिनेन्द्र"
तक की महायात्रा पर अग्रसर है ।
जहाँ ज्ञान बांटने वाले हाथ अब आत्म कल्याण के लिए जुड़ेंगे। श्रद्धा और वैराग्य का यह अनुपम संगम हम सभी के लिए प्रेरणा का पुंज है।
वागड़ की पावन धरा को नमन !
राजस्थान का वागड़ अंचल केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं बल्कि आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है।
आचार्य भरत सागर जी(लोहारिया), आचार्य रयण सागर जी (सागवाड़ा), आचार्य चंद्रगुप्त जी ( चितरी) जैसे मनीषियों के साथ आर्यिका देवयश मति माताजी(गढ़ी) एवं आर्यिका देवागम मति माताजी (अरथूना) की जन्मभूमि वागड़ रही है। परतापुर को कड़वे प्रवचन के लिए प्रख्यात राष्ट्रीय संत आचार्य तरुण सागर जी,अंतर्मना साधना महोदधि आचार्य प्रसन्न सागर जी की दीक्षा भूमि होने का गौरव प्राप्त होने के साथ मुनि श्री प्रबुद्ध सागर जी , मुनि श्री विश्वलोकेश सागर जी, मुनि श्री विश्वभद्र सागर जी ,मुनि श्री अप्रमत सागर जी, मुनि श्री परिमल सागर जी, आर्यिका श्री वियोजनाश्री माताजी, आर्यिका श्री प्रशम श्री माताजी, आर्यिका श्री पलक श्री माताजी, आर्यिका श्री विशालश्री माताजी,आर्यिका श्री सिद्धार्थ मति माताजी, आर्यिका श्री ज्ञानप्रभा माताजी, आर्यिका श्री चरित्रप्रभा माताजी, क्षुल्लक श्री अर्ध सागर जी,क्षुल्लिका श्री धर्मप्रभा माताजी की जन्म स्थली परतापुर है।
व्यक्तिगत परिचय -
नाम~ संजय एन दोसी
जन्म ~16 फरवरी,1972
जन्म स्थान ~परतापुर
धर्म पत्नी ~श्रीमती मैना दोसी
पारिवारिक पृष्ठभूमि -
माता - पिता ~ श्रीमती निर्मला देवी - श्री नथमल दोसी
दादा- दादी ~श्री कस्तूर चंद - श्रीमती गमनी बाई
नाना - नानी~ श्री नाथूलाल दोसी- श्रीमती चमेली देवी
सास - ससुर ~ श्री जीतमल खोड़निया -श्रीमती मणि देवी
भाई- भाभी~ श्री दिलीप दोसी -श्री मती
संतान एवं परिवार -
सुपुत्र ~ श्री चिंतन दोसी
सुपुत्री - जमाई ~श्रीमती मुक्ति गांधी - श्री आदिश गांधी
विवाह ~ 10 मई,1997 परतापुर
धर्म पत्नी ~श्रीमती मैना दोसी
व्यावसायिक कार्यक्रम -
शैक्षणिक योग्यता ~B.A. ,B.Ed
प्रथम नियुक्ति ~30/9/1997
स्वैच्छिक सेवानिवृति~01/11/2024
दीक्षार्थी संजय भैया की वैराग्य यात्रा: धर्म और तप का संगम
संस्कारों का बीजारोपण ~
संजय भैया के वैराग्य की यात्रा का आधार उनकी माँ श्रीमती निर्मला देवी के गर्भ से प्राप्त संस्कारों ने रखा। जन्म के उपरांत दादी के धार्मिक सानिध्य और संस्कारों ने इस वैराग्य की भावना को और प्रगाढ़ कर दिया ।
वैराग्य का अंकुरण ~
वैराग्य की भावना तन अंकुरित हुई जब परतापुर में आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज ससंघ परतापुर आगमन हुआ । उस समय मुनि तरुण सागर जी की आहारचर्या में सम्मिलित होना, उनकी वैयावृत्ति करना , संघस्थ ब्रह्मचारी विवेक भैया,दिलीप भैया के साथ धार्मिक गतिविधियों में सहयोग करने से उनके मन में दीक्षा के भाव
जागृत हुए। यद्यपि उस समय दीक्षा संभव नहीं हो पाई किंतु उन्होंने संकल्प लिया कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए धर्म मार्ग पर अडिग रहेंगे।
गृहस्थ में संयम की साधना ~
श्रीमती मैना दोसी के साथ परिणय सूत्र में बंधने के उपरांत उनकी पहली धार्मिक यात्रा देहरादून की रही।वहां आचार्य पुष्पदंत सागर जी ससंघ के दर्शन कर माह में एक दिन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया।उसके बाद अनेक आचार्य,मुनिराज के दर्शन किए। डोंगरगढ़ में आचार्य विद्या सागर जी महाराज के दर्शन कर अपनी धर्म पत्नि के साथ माह में 28 दिनों का ब्रह्मचर्य व्रत का नियम लिया।
तप और त्याग का पथ ~
क्रमशः साधना बढ़ती गई और उन्होंने नमक एवं अन्य रसों का त्याग कर दिया। संजय भैया व मैना दोसी ने भक्तामर, पंच मेरू,सोलह कारण के उपवास, दस लक्षण महापर्व के कठिन उपवास किये। उनकी इस साधना यात्रा में अर्धांगिनी मैना जी का हर कदम पर पूर्ण सहयोग रहा।
प्रतिमा व्रत और संन्यास की ओर बढ़ते कदम ~
परतापुर में आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज के आगमन पर, अपने निवास पर आहार चर्या के सौभाग्य के बाद दोनों ने "प्रथम प्रतिमा" के व्रत अंगीकार किए । इसके उपरांत सिंह निष्क्रिडित व्रत कर्ता,अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागर जी मुनिराज की तप आराधना के बाद पार्श्वनाथन टोक सम्मेद शिखर जी पर दोनों ने "द्वितीय प्रतिमा " ग्रहण की। वर्तमान भौतिकवादी युग में संजय भैया और मैना जी ने गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी "संन्यास " की अवधारणा को चरितार्थ कर समाज के सम्मुख एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।
विशेष आशीर्वाद ~
आचार्य 108 श्री विद्या सागर जी
आचार्य 108श्री पुष्पदंत सागर जी
आचार्य 108कनक नंदी गुरुदेव
आचार्य 108 श्री सुनील सागर जी
आचार्य 108 श्री सुंदर सागर जी
मुनि 108आज्ञा सागर जी
आर्यिका 105 विज्ञान मति माताजी
विशेष उपलब्धि
1.माता - पिता के वैवाहिक जीवन की 50वीं वर्षगांठ एवं स्वयं के वैवाहिक जीवन की 25 वीं वर्षगांठ पर सिद्ध चक्र महामंडल विधान का आयोजन परतापुर में सम्पन्न कर 25 संयम व्रत पालन का नियम लिया।
2.भगवान की प्रतिमा स्थापित करने का सौभाग्य मिला।
3.बांसवाड़ा में आयोजित प्रतिष्ठा में भगवान के माता पिता बनने का सौभाग्य मिला।
गुरु भक्ति -
1.वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनकनंदी जी गुरुदेव के प्रति उनका त्याग ,समर्पण और भीलुड़ा के शिवगौरी आश्रम में 2025का ऐतिहासिक वर्षायोग सम्पन्न करवाना उनके गहरे पुण्य का प्रमाण है।
2.आचार्य सुंदर सागर जी मुनिराज एवं मुनि आज्ञा सागर जी मंगल आशीर्वाद ने संयम पथ पर बढ़ने के लिए सदैव प्रेरित किया।
निः स्वार्थ सेवा -
1."साधु सेवा संस्थान"के माध्यम से आप द्वारा 300 गुरु भक्तों को जोड़कर संस्थान के माध्यम से 3बार सम्मेद शिखर जी कि निः शुल्क यात्रा सफलता पूर्वक आयोजित की।
2.तरुण क्रांति मंच गढ़ी - परतापुर में सक्रिय सदस्य की भूमिका निभाते हुए आम जन के लिए अनेक निः शुल्क कैंपों का आयोजन किया।
3. राजकीय चिकित्सालय में रोगियों एवं परिजनों के लिए "निः शुल्क भोजनालय" की व्यवस्था करना।
4.गौ शाला का निर्माण में अहम भूमिका निभाते हुए मूक प्राणियों के प्रति दया,करुणा के भाव
5.विद्यालयों में सहयोग के माध्यम से उन्होंने भावी पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए।
6.योग गुरु की भूमिका निर्वहन करते हुए लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।
संजय भैया का जीवन वास्तव में इस बात का प्रमाण है कि परिवार ओर व्यापार के बीच भी आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।
स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति -
एक राजकीय पद जो समाज में सम्मान का प्रतीक के माना जाताहै ,उसे त्यागना यह दर्शाता है कि उनके लिए 'स्व' की खोज बाहरी उपलब्धियां से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी। यह संदेश आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि इच्छा शक्ति का बल यह साबित करता है कि वैराग्य केवल पलायन नहीं बल्कि एक सचेत और साहसी निर्णय है।
प्रेरणा -
संजय भैया का जीवन उन सभी के लिए एक मशाल है जो आधुनिक भागदौड़ के बीच अपनी आत्मिक शांति की तलाश कर रहे है।
संजय भैया का दीक्षा दिवस-
दीक्षार्थी संजय भैया की भव्य जैनेश्वरी दीक्षा रविवार 26अप्रैल , 2026 को सुभाष चंद्र बोस स्टेडियम परतापुर में प्रातः 7बजे से 10बजे के मध्य अंतर्मना, साधना महोदधि, सिंह निष्क्रिडित व्रत कर्ता आचार्य 108 प्रसन्न सागर जी मुनिराज ने 28 मूलगुण एवं 16 संस्कारों का बीजारोपण कर नवीन नामकरण मुनि 108 श्री सामायिक सागर जी रखा। तत्पश्यात आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी के कर कमलों से पिच्छिका,जिनवाणी एवं कमंडल ग्रहण किया। दीक्षा समारोह में तपाचार्य प्रसन्न सागर जी ने पांच दिशाएं प्रदान की जिसमें क्षुल्लक 105 अर्घ्य सागरजी बने मुनिराज 108 श्री अर्घ्य सागरजी, क्षुल्लिका 105 धर्म प्रभा माताजी बनी आर्यिका 105 धर्म प्रभा माताजी, कनक दीदी बनी क्षुल्लिका 105 द्रव्य प्रभा माताजी, सुशीला दीदी बनी क्षुल्लिका भाव प्रभा माताजी। समारोह में वागड़, मारवाड़ ,गुजरात ,महाराष्ट्र , समूचे भारत से हजारों गुरुभक्त इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनने उपस्थित थे।
आलेख ~कमलेश कुमार जैन (गढ़ी)
उप प्राचार्य,राउमावि आंजना