कट्टरता नहीं, सहअस्तित्व ही मानवता का मार्ग
17 मई 2026
कट्टरता नहीं, सहअस्तित्व ही मानवता का मार्ग
भारत और विश्व की राजनीति, धर्म तथा समाज को लेकर आज जिस प्रकार की बहसें चल रही हैं, उनमें भावनाएँ अक्सर तथ्यों और संतुलन पर भारी पड़ जाती हैं। ऐसे समय में आवश्यक है कि हम इतिहास, वर्तमान और मानवतातीनों को साथ रखकर विवेकपूर्ण दृष्टि विकसित करें। मुस्लिम समाज की वैश्विक स्थिति, हिंदू समाज की भूमिका, और राजनीतिक शक्तियों द्वारा पैदा किए जा रहे भयइन सभी विषयों पर गंभीर विवेचना की आवश्यकता है।
इतिहास गवाह है कि 1526 के बाद भारत सहित विश्व के अनेक हिस्सों में मुस्लिम शासकों और सल्तनतों का प्रभाव बढ़ा। उस दौर में सत्ता संघर्ष, आक्रमण और हिंसा केवल किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं थे; लगभग हर साम्राज्य विस्तारवादी प्रवृत्तियों से प्रेरित था। इसलिए पूरे मुस्लिम समाज को केवल आक्रांता की पहचान से देखना इतिहास की जटिलता को सरल बना देना होगा। यह भी सच है कि समय के साथ हर साम्राज्य कमजोर हुआ हैचाहे वह मुगल हों, ब्रिटिश हों या अन्य शक्तियाँ।
आज दुनिया के कई मुस्लिम बहुल देशोंजैसे Pakistan, Afghanistan, Iran, Iraq और Bangladeshमें राजनीतिक अस्थिरता, गरीबी, युद्ध और आंतरिक संघर्ष दिखाई देते हैं। लेकिन यह स्थिति केवल धार्मिक पहचान का परिणाम नहीं है; इसके पीछे औपनिवेशिक इतिहास, तानाशाही शासन, विदेशी हस्तक्षेप, आर्थिक असमानता और शिक्षा की कमी जैसे अनेक कारण रहे हैं। आम मुसलमान भी उसी तरह शांति, सम्मान और बेहतर जीवन चाहता है जैसे दुनिया का कोई भी सामान्य नागरिक।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी बहुलता और सहिष्णुता रही है। भारत ने सदियों से विभिन्न धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों को अपने भीतर स्थान दिया है। हिंदू सभ्यता की मूल भावना वसुधैव कुटुम्बकम् रही हैयानी पूरा विश्व एक परिवार है। यही कारण है कि भारत ने अनेक समुदायों को शरण और सम्मान दिया। यह उदारता कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का प्रतीक है। हालाँकि, वर्तमान समय में राजनीति का एक बड़ा संकट यह है कि कई शक्तियाँ समाज में भय और असुरक्षा का वातावरण बनाकर सत्ता को मजबूत करना चाहती हैं। डर सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार होता है। कभी हिंदुओं को मुसलमानों से डराया जाता है, तो कभी मुसलमानों को हिंदुओं से। इससे दोनों समुदायों के सामान्य लोग मानसिक तनाव और अविश्वास में जीने लगते हैं, जबकि लाभ केवल राजनीतिक समूहों को मिलता है।
यह भी समझना होगा कि कट्टरता किसी एक धर्म या विचारधारा तक सीमित नहीं होती। हर प्रकार की अतिवादी सोच समाज को बाँटती है। यदि कोई समूह धर्म, जाति या राष्ट्रवाद के नाम पर नफरत फैलाता है, तो अंततः उसका दुष्प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में असली शक्ति जनता की एकता और संवैधानिक मूल्यों में है, न कि भय और विभाजन में।
1974 के आंदोलन और उसके बाद की राजनीति का उल्लेख यह दर्शाता है कि भारत की राजनीति में विचारधारात्मक परिवर्तन किस प्रकार हुए। कई राजनीतिक शक्तियाँ जन आंदोलनों के सहारे उभरीं और समय के साथ सत्ता के केंद्र तक पहुँचीं। लेकिन किसी भी लोकतंत्र में जनता का दायित्व केवल सरकार चुनना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना भी होता है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब नागरिक भावनाओं के बजाय विवेक से निर्णय लें।
अंततः सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही हैसमाज को क्या मिला? यदि हमारी राजनीति लोगों को आपस में लड़ाकर आगे बढ़ती है, तो चाहे कोई भी सत्ता में हो, नुकसान देश और समाज का ही होगा। मानवता का अर्थ केवल अपने समुदाय की रक्षा नहीं, बल्कि हर कमजोर और पीड़ित व्यक्ति के साथ खड़ा होना है।
समय के साथ हर समाज और हर व्यक्ति को अपनी सोच में बदलाव लाना पड़ता है। कोई भी समुदाय जन्म से न बड़ा होता है, न छोटा। मनुष्य की पहचान उसके कर्म, संवेदनशीलता और विचार से बनती है। इसलिए आज आवश्यकता कट्टरता नहीं, संवाद की है; नफरत नहीं, सहअस्तित्व की है। रक्षक वही है जो न स्वयं डरता है, न दूसरों को डराता है। यही भारत की आत्मा है, और यही मानवता का सच्चा मार्ग भी।
नरेंद्र