धरा की अनमोल धरोहर:
सियासत से सरोकार तक,
गया के ब्रह्मयोनी पहाड़ से गूंजा पर्यावरण का संकल्प,
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
गयाजी: "वृक्ष लगाएं – जीवन बचाएं!
यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि इस इक्कीसवीं सदी में मानव अस्तित्व को बचाए रखने का इकलौता मंत्र है।"
आज 5 जून 2026, 'विश्व पर्यावरण दिवस' के अवसर पर बिहार की ज्ञान और मोक्ष की भूमि गया से एक बेहद सकारात्मक तस्वीर सामने आई है।
गया जदयू महानगर के साथियों ने एकजुट होकर ऐतिहासिक ब्रह्मयोनी पहाड़ पर पीपल और नीम जैसे औषधीय व दीर्घायु वृक्षों का रोपण कर प्रकृति के संरक्षण का महासंकल्प लिया है।
ऐसे समय में जब कंक्रीट के जंगल हमारी हरी-भरी वादियों को निगल रहे हैं, तब राजनीतिक कार्यकर्ताओं का जमीन पर उतरकर कुदाल थामना और पौधे लगाना एक नई और स्वस्थ राजनीति का संकेत है।
ब्रह्मयोनी पर पीपल-नीम का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक महत्व,
गया का ब्रह्मयोनी पहाड़ सदियों से तपस्या और इतिहास का साक्षी रहा है। पथरीली चट्टानों से घिरे इस क्षेत्र को आज 'हरित आवरण' की सख्त जरूरत है।
कार्यकर्ताओं द्वारा पीपल और नीम के पौधों का चयन उनकी गहरी सूझबूझ को दर्शाता है। पीपल जहाँ चौबीसों घंटे ऑक्सीजन का उत्सर्जन कर वातावरण को प्राणवायु से भर देता है, वहीं नीम प्रकृति के 'थर्मामीटर' और 'फार्मेसी' की तरह काम करता है।
ये पेड़ आने वाले समय में न केवल इस पहाड़ी की मिट्टी के कटाव को रोकेंगे, बल्कि यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को शीतल छाया भी प्रदान करेंगे।
धरती की सुंदरता और जीवन चक्र के असली रक्षक
जैसा कि सोशल मीडिया पोस्ट में बेहद खूबसूरती से रेखांकित किया गया है—“वृक्ष प्रभु की इस धरा की सबसे सुंदर और अनमोल धरोहर हैं।”
आज का मानव विकास की अंधी दौड़ में यह भूल गया है कि ग्लोबल वार्मिंग, बेमौसम बरसात और भीषण गर्मी जैसी आपदाएं प्रकृति के साथ किए गए खिलवाड़ का ही नतीजा हैं।
वृक्ष सिर्फ लकड़ी या फल नहीं देते, वे धरती के फेफड़े हैं। यदि फेफड़े ही बीमार हो जाएं, तो जीवन चक्र का थम जाना तय है।,
सियासत का सामाजिक चेहरा,
अक्सर राजनीतिक दलों को केवल चुनाव, रैलियों और नीतिगत बहसों से जोड़कर देखा जाता है।
लेकिन जब कोई राजनीतिक संगठन सामाजिक दायित्वों को अपनी प्राथमिकता बनाता है, तो वह समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है।
जदयू महानगर के इस सामूहिक प्रयास ने साबित किया है कि 'पर्यावरण संरक्षण' किसी एक व्यक्ति या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह हम सभी का साझा 'कर्तव्य' है।
निष्कर्ष:
आने वाली पीढ़ियों के प्रति जवाबदेही
हम अपनी आने वाली पीढ़ी को विरासत में कैसी धरती सौंपना चाहते हैं?
जहरीली हवा और पानी, या फिर एक स्वच्छ और हरा-भरा भविष्य?
जवाब साफ है।
गया से शुरू हुआ यह संकल्प केवल एक दिन का उत्सव बनकर नहीं रहना चाहिए।
जरूरत इस बात की है कि आज लगाए गए इन पौधों को वृक्ष बनने तक सींचा जाए और उनकी देखभाल की जाए।
आइए, इस पर्यावरण दिवस पर गया के इस संदेश को आत्मसात करें। अपने जीवन के हर विशेष अवसर पर कम से कम एक पौधा जरूर लगाएं। क्योंकि पेड़ बचेंगे, तभी प्रकृति बचेगी और प्रकृति बचेगी, तभी हम बचेंगे!