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दल का आंतरिक मामला सदन के भीतर, जनहित के मुद्दे दरकिनार…?

छत्तीसगढ़ विधानसभा का मानसून सत्र 26 जुलाई को प्रारंभ हुआ, उम्मीद थी ​कि सदन में जनता के हित से जुड़े मसालों पर अहम फैसले लिए जाएंगे। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ, जनता की उम्मीदों पर पानी फिर गया। मानसून सत्र का पहला दिन सत्ता पक्ष के विधायक बृहस्पति सिंह और सरकार के मंत्री टीएस सिंहदेव के मतभेद का भेंट चढ़ गया।

27 जुलाई का दूसरा दिन भी इसी हंगामें की भेंट चढ़ गया। अंततः विधानसभा 28 जुलाई तक के लिए स्थगित हो गई। ऐसे में ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यहां कांग्रेस की सत्ता पर बैठे सर्वोच्च नेतागण और विपक्ष के कुछ लोगों के बीच सांठगांठ है, जिसके कारण विधानसभा में जो प्रदेश की जनहित की ज्वलंत मुद्दे उठने चाहिए थे, वह नहीं उठ पा रहे हैं।

अब सत्र के मात्र 3 दिन बचे हैं, सरकार को विधानसभा में कई विधेयक पास करने हैं, ये सभी विधेयक आनन-फानन में पास कर दिए जाएंगे, नुकसान प्रदेश की जनता का हुआ और होगा, सही कहे तो प्रदेश की जनता के टैक्स के पैसों से प्रतिदिन विधानसभा की कार्यवाही संचालन के लिए जो लाखों रुपए खर्च होते हैं, उसका नुकसान अलग होगा।

सत्ता पक्ष के विधायक बृहस्पति सिंह और मंत्री टीएस सिंहदेव का मामला कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस सरकार का आंतरिक मामला है, जिसे विधानसभा में मुद्दा बना दिया गया है। बृहस्पति सिंह ने विधानसभा में अपने ऊपर हुए हमले के बारे में विधानसभा अध्यक्ष को कोई लिखित जानकारी नहीं दी है, न ही पुलिस द्वारा अंबिकापुर में दर्ज एफआईआर में इस मामले का जिक्र है।

तो फिर इसे मुद्दा बनाकर विधानसभा की कार्रवाई क्यों बाधित की जा रही है? जबकि कई ध्यानाकर्षण और स्थगन पर आज यानि 27 जुलाई को चर्चा होनी चाहिए थी वह सब रुक गईं। 28, 29, 30 जुलाई केवल 3 दिन सत्र के और बचे हैं, बाकी बचे इन तीन दिनों के सत्र में मंत्री और कांग्रेस विधायक के बीच का मामला बताकर विधानसभा को बाधित किया जाना जनता के हित में तो कतई नहीं माना जा सकता।

छत्तीसगढ़ की जागरूक जनता और बुद्धिजीवी विधानसभा की घटना को लेकर काफी विचलित हैं, जिस विधानसभा में प्रदेश की जनता के हित के लिए अहम निर्णय होने चाहिए वहाँ जनता की आवाज की गूंज ही नहीं सुनाई दे रही है, इस बारे में विधानसभा के अंदर गंभीर चर्चा हो, यह सोच आम जनता की है।

लेकिन, अभी जो हालात हैं उसमें सब गौण हो गया है, पता नहीं कब किसी पार्टी के आंतरिक मामले को राजनीतिक रंग देकर विधानसभा में हंगामा हो जाए। जरूरत तो इस बात की है विधानसभा जैसी राज्य की सर्वोच्च संस्था को उनकी गरिमा के अनुरूप ही संचालित होने दिया जाए, उसे राजनीति का अखाड़ा बनाने की बजाए सदन की मर्यादा के अनुरूप संचालित किया जाए।

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