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सात वर्षों से एक ही अधिकारी के पास तीन परियोजनाओं का प्रभार: महिला एवं बाल विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर उठने लगे गंभीर सवाल
सात वर्षों से एक ही अधिकारी के पास तीन परियोजनाओं का प्रभार: महिला एवं बाल विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर उठने लगे गंभीर सवाल
सारंगढ़-बिलाईगढ़। जिले के महिला एवं बाल विकास विभाग अंतर्गत संचालित एकीकृत बाल विकास परियोजनाओं की प्रशासनिक व्यवस्था अब सवालों के घेरे में दिखाई देने लगी है। विभागीय सूत्रों के अनुसार एकीकृत बाल विकास परियोजना बिलाईगढ़ में पदस्थ परियोजना अधिकारी तेजस्वी ध्रुव वर्ष 2019 से लगातार लगभग सात वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ हैं। इतना ही नहीं, उनके पास परियोजना बिलाईगढ़, कोसीर और भटगांव—तीनों का अतिरिक्त प्रभार भी है।
एक ही अधिकारी के पास तीन महत्वपूर्ण परियोजनाओं का नियंत्रण होना, स्थानीय प्रशासनिक हलकों में चर्चा और संदेह का विषय बन गया है।
महिला एवं बाल विकास विभाग जैसी संवेदनशील व्यवस्था आंगनबाड़ी केंद्रों का संचालन, पोषण आहार वितरण, हितग्राहियों का सत्यापन, वित्तीय निरीक्षण, विभागीय अनुश्रवण, खरीदी प्रक्रियाएं, कर्मचारियों की निगरानी तथा अन्य कई योजनाओं का क्रियान्वयन जैसी जटिल जिम्मेदारियों से जुड़ी होती है। ऐसे में इतने महत्वपूर्ण कार्यों का भार एक ही अधिकारी पर लंबे समय तक बने रहना न केवल प्रशासनिक दबाव बढ़ाता है, बल्कि व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
प्रशासनिक सूत्रों का मानना है कि सामान्यतः अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था अस्थायी परिस्थितियों में सीमित अवधि के लिए दी जाती है। किंतु वर्षों तक एक ही अधिकारी के पास कई परियोजनाओं का नियंत्रण रहना अनेक प्रकार की आशंकाओं को जन्म देता है। चर्चाएं यह भी हैं कि जब एक अधिकारी के पास तीन परियोजनाओं के प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकार हों, तब निष्पक्ष निगरानी और स्वतंत्र परीक्षण की व्यवस्था स्वतः कमजोर हो सकती है। इससे योजनाओं के संचालन, व्यय प्रक्रिया, फाइल संधारण, निरीक्षण रिपोर्ट और विभागीय नियंत्रण प्रणाली पर संदेह उठना स्वाभाविक है।
जानकारी यह भी सामने आई है कि विभागीय पारदर्शिता के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रशासनिक संतुलन और स्वतंत्र निगरानी अत्यंत आवश्यक मानी जाती है। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में निरंतर बहु-प्रभार की स्थिति से प्रशासनिक विसंगतियों की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। यही कारण है कि स्थानीय स्तर पर चर्चाएं तेज हो रही हैं और यह सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर ऐसी कौन-सी ‘प्रशासनिक मजबूरी’ है, जिसके चलते एक ही अधिकारी को सात वर्षों से तीन-तीन परियोजनाओं का प्रभार सौंपा गया है।
विशेष रूप से परियोजना भटगांव को लेकर स्वतंत्र प्रभार की मांग क्षेत्रीय स्तर पर जोर पकड़ रही है। स्थानीय लोगों का स्पष्ट मत है कि भटगांव परियोजना का संचालन किसी स्वतंत्र अधिकारी—जैसे डिप्टी कलेक्टर, तहसीलदार अथवा नायब तहसीलदार भटगांव—को सौंपा जाना चाहिए। उनका कहना है कि अलग-अलग अधिकारियों के माध्यम से परियोजनाओं का संचालन होने से पारदर्शिता और प्रशासनिक नियंत्रण अधिक मजबूत होगा।
अब यह मामला केवल ‘अतिरिक्त प्रभार’ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विभागीय निष्पक्षता, पारदर्शिता और प्रशासनिक विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर विषय बन गया है। ऐसे में जिला प्रशासन तथा महिला एवं बाल विकास विभाग से अपेक्षा की जा रही है कि मामले का गंभीरता से परीक्षण कर संतुलित एवं पारदर्शी प्रशासनिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की अनियमितता या संदेह की स्थिति उत्पन्न न हो।
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