*प्रकाशनार्थ**
*वामपंथ और संघ के बीच क्या वैचारिक टकराव है?*
*(बांग्ला आलेख : मोहम्मद सलीम, अनुवाद : संजय पराते)*
*भाग एक*
कुछ साल पहले, विजया दशमी के मौके पर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक (प्रमुख) मोहन भागवत ने नागपुर स्थित संगठन के मुख्यालय में एक नए शब्द का ज़िक्र किया था — ‘सांस्कृतिक मार्क्सवादी।'
लेकिन यह शब्द बिल्कुल भी 'भारतीय' नहीं है। इसे विदेश से आयात किया गया था। जैसा कि आरएसएस के वैचारिक नेता राम माधव ने स्वीकार किया था : 'सांस्कृतिक मार्क्सवाद और जागरणवाद (वोकइज़्म) की अपनी आलोचना में, भागवत को पश्चिम में कई समर्थक मिलेंगे।' (इंडियन एक्सप्रेस, 28 अक्टूबर, 2023)।
राम माधव सही थे। 'सांस्कृतिक मार्क्सवाद' शब्द सुनने में भले ही 'उत्तर-आधुनिक' लगे, लेकिन इसकी एक लंबी और ज़हरीली विरासत है (न्यूयॉर्क टाइम्स, 13 नवंबर, 2018)। पिछली एक सदी से, अति-दक्षिणपंथी इस शब्द का इस्तेमाल करते आ रहे हैं, और नव-फ़ासीवादी तो इसे लगातार और चिंताजनक ढंग से इस्तेमाल कर रहे हैं। फ़ासीवाद ने लगातार मार्क्सवाद को निशाना बनाया है — शुरू में इसे 'यहूदी बोल्शेविज़्म' का नाम दिया, और बाद में 'सांस्कृतिक मार्क्सवाद' कहा। नॉर्वे के अति-दक्षिणपंथी उग्रवादी एंडर्स ब्रेविक ने, जिसने जुलाई 2011 में ओस्लो के एक समर कैंप में 77 बेकसूर लोगों की हत्या का जघन्य अपराध किया था, अपने 1,500 पन्नों के घोषणापत्र में इस शब्द का 600 बार ज़िक्र किया था।
यह बात व्यापक रूप से मानी जाती है कि देश की सीमाओं के भीतर और बाहर, दोनों जगह दुश्मनों की पहचान करना, सत्ता को मज़बूत करने के लिए तानाशाह नेताओं द्वारा अक्सर अपनाई जाने वाली एक रणनीति है। भारत में, मोहन भागवत ने वामपंथी और प्रगतिशील ताकतों के खिलाफ़ तीखी प्रतिक्रिया भड़काने के लिए इसी तरह की बयानबाज़ी की है। वामपंथी ताकतें आरएसएस की फ़ासीवादी विचारधारा और मोदी सरकार के उन तानाशाही कदमों का विरोध कर रही हैं, जो भारत की विविधता की परंपरा को कमज़ोर कर रही हैं। भागवत का मकसद, पश्चिमी धुर-दक्षिणपंथी समूहों की बयानबाज़ी को अपनाकर, इस देश के वामपंथियों को 'भारतीय संस्कृति' के दायरे से बाहर दिखाना है। यह उन्हें 'पराया' बनाने का एक तरीका है।
बदनामी का यह अभियान वामपंथी छात्र आंदोलनों और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों — जिनमें लेखक, शोधकर्ता और शिक्षाविद शामिल हैं — को दबाने का एक जान-बूझकर किया गया प्रयास है। इसके पीछे की मूल धारणा यह है कि साम्यवाद अपने आप में एक 'विदेशी' विचारधारा है ; इसके दार्शनिक आधार, वैचारिक सिद्धांत, प्रतीकात्मक हस्तियाँ और प्रेरक स्थल — ये सभी भारत की सीमाओं के बाहर उत्पन्न हुए हैं, और इस प्रकार यह इसके अनुयायियों को 'बाहरी' सिद्ध करता है।
जैसे-जैसे अति-दक्षिणपंथी राजनीति को ज़ोर मिल रहा है, यह दुष्प्रचार भी तेज़ होता जा रहा है। लोगों को 'बाहरी' करार देना अब एक महज़ औपचारिकता बनकर रह गया है। बहरहाल, यह परिघटना केवल भारत तक ही सीमित नहीं है। वैश्विक स्तर पर, अति-दक्षिणपंथी समूह एक जानी-पहचानी रणनीति अपनाते हैं : ज़ेनोफ़ोबिया, जिसके तहत विदेशियों को लेकर एक अतार्किक भय और बेवजह की घबराहट पैदा की जाती है। यह रवैया ट्रंप के अमेरिका, फ्रांस में मरीन ले पेन की नव-फ़ासीवादी 'नेशनल रैली', जर्मनी की नव-नाज़ी 'अल्टरनेटिव फ़ॉर जर्मनी', इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी की 'ब्रदर्स ऑफ़ इटली' — जो मुसोलिनी की वैचारिक उत्तराधिकारी है — और स्पेन की नव-फ़्रैंकोवादी 'वॉक्स पार्टी' में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है ; ये सभी एक ही तरह के नैरेटिव (आख्यान) से चिपके रहते हैं।
भारत में, आरएसएस लंबे समय से ‘दुश्मनों’ की पहचान करने में लगा हुआ है। संघ के दूसरे सरसंघचालक और सर्वोच्च वैचारिक मार्गदर्शक माधव सदाशिव गोलवलकर ने अपनी किताब ‘बंच ऑफ़ थॉट्स’ में कथित ‘हिंदू राष्ट्र’ के लिए तीन ‘आंतरिक खतरों’ की पहचान की थी : मुस्लिम, ईसाई और कम्युनिस्ट। अपने घोर मुस्लिम-विरोधी लेखन में, ‘गुरुजी’ गोलवलकर ने यह तर्क दिया कि इस देश में सह-अस्तित्व के लिए, मुस्लिमों को ‘दूसरे दर्जे की नागरिकता स्वीकार करनी होगी, बहुमत के वर्चस्व के आगे झुकना होगा और उनके उत्पीड़न को सहना होगा।
मोदी और मोहन भागवत आज एक जैसी ही भावनाएँ व्यक्त कर रहे हैं। इस आख्यान में कुछ भी नया नहीं है। उनके अनुसार, कम्युनिस्टों से जुड़ी हर चीज़ विदेशी है —चाहे वे मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और स्टालिन जैसी प्रभावशाली हस्तियाँ हों, या फिर 'कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो' जैसा उनका मूल ग्रंथ ही क्यों न हो।
*भाग दो*
दुनिया की महानतम खोजें, कालजयी विचार, सोचने के अनोखे तरीके, सुंदर साहित्य और दर्शन, तथा अद्भुत कला और मूर्तिकला — इन सबमें एक सार्वभौमिक आकर्षण होता है। क्या लियोनार्डो दा विंची की अमर कृति 'मोना लिसा' सिर्फ़ इटली की धरोहर है? फिर क्यों उसकी वह मशहूर मुस्कान दूर बंगाल के लगभग हर मोहल्ले में गूँजती है? माइकल एंजेलो की पुनर्जागरण-युग की उत्कृष्ट कृति 'डेविड' इटली के फ्लोरेंस शहर में स्थापित है। वैन गॉग और पिकासो की असाधारण कृतियों के बारे में क्या कहेंगे? क्या वे सिर्फ़ नीदरलैंड, स्पेन या फ़्रांस की ही संपत्ति हैं? क्या शेक्सपियर का नाटक 'ओथेलो' सिर्फ़ अंग्रेज़ों के लिए ही लिखा गया था? फिर क्यों आज भी बंगाल के मंचों पर उसका मंचन किया जाता है? या फिर बर्टोल्ट ब्रेख्त के नाटक 'डाई मुटर' (माँ) पर ही विचार करें, जो गोर्की के उपन्यास पर आधारित है — उत्पल दत्त के बंगाली अनुवाद में वह मार्मिक दृश्य जीवंत हो उठता है, जहाँ पावेल की माँ अपने बेटे की मृत्यु से शोकाकुल होकर, उसकी याद में गीत गाते हुए मज़दूरों को सुनती है। गोर्की, ब्रेख्त और उत्पल दत्त — भले ही वे अलग-अलग महाद्वीपों के निवासी थे, किंतु उनकी आवाज़ें एक-दूसरे में एकाकार हो गई हैं।
क्या आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत को हमारे पाठ्यक्रम से सिर्फ इसलिए हटा दिया जाना चाहिए, क्योंकि वे जर्मन थे? अगर हम इसका अध्ययन छोड़ देते हैं, तो हम यह कैसे समझ पाएँगे कि एक सदी पहले उन्होंने जो भी गणितीय भविष्यवाणियाँ की थीं, उनमें से लगभग हर एक सही साबित हुई है, और यह कि पूरा ब्रह्मांड उन्हीं नियमों के अनुसार चलता है, जिन्हें उन्होंने समझाया था। नोबेल पुरस्कार विजेता भौतिक विज्ञानी रिचर्ड फेनमैन ने एक बार कहा था : एक वैज्ञानिक की खोजें और एक वैज्ञानिक का जीवन — ये दोनों ही अपने आप में एक महाकाव्य हैं। दुख की बात यह है कि इन्हें लिखने के लिए कोई होमर मौजूद नहीं है। और सच भी तो यही है — क्या 'इलियड' या 'ओडिसी' सिर्फ़ यूनानियों के लिए हैं? क्या 'रामायण' और 'महाभारत' सिर्फ़ भारतीयों के लिए हैं? क्या मोज़ार्ट और बीथोवेन का अद्भुत संगीत सिर्फ़ ऑस्ट्रिया का है?
इक्वाडोर रूस से बहुत दूर स्थित एक छोटा-सा लैटिन अमेरिकी देश है, जिसकी आबादी दो करोड़ से भी कम है। 1950 से 2015 के बीच इक्वाडोर में, 18,464 लोगों के नाम 'लेनिन' रखे गए — जो कि एक बेहद चौंकाने वाला आँकड़ा है। इससे भी बढ़कर, 18,728 लोगों के नाम 'स्टालिन' रखे गए (मियामी हेराल्ड, 3 अप्रैल, 2017)।
लेकिन इतिहास की बुनियादी समझ से पता चलता है कि ‘हिंदू’ शब्द असल में फ़ारसी लोगों ने गढ़ा था। सिंधु नदी से लिया गया यह शब्द, जिसमें ‘स्तान’ का मतलब ‘जगह’ होता है, असल में भौगोलिक मूल का है। अमेरिका से लौटने के बाद जाफ़ना में दिए अपने भाषण में स्वामी विवेकानंद ने भी इसी बात को दोहराया था ; उन्होंने बताया था कि प्राचीन फ़ारसी लोग ‘सिंधु’ का उच्चारण ‘हिंदू’ के रूप में करते थे, और इस शब्द का इस्तेमाल वे उन लोगों के लिए करते थे, जो नदी के दूसरी तरफ़ रहते थे।
मोदी के अपने 'आदर्श', विनायक दामोदर सावरकर ने हिंदुत्व और हिंदू धर्म के बीच एक साफ़ लकीर खींची थी, और कहा था : 'हिंदुत्व एक राजनीतिक परियोजना है। इसका हिंदू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।' तो फिर यह सवाल उठता है कि सावरकर के 'हिंदुत्व' के नज़रिए में क्या शामिल है? उन्होंने अपनी किताब 'वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड' में इस पर रोशनी डाली है, जहाँ उनकी 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की अवधारणा साफ़ तौर पर हिटलर की विचारधारा पर आधारित थी— 'जर्मन नस्ल पर गर्व अब आज का सबसे अहम मुद्दा बन गया है। नस्ल और उसकी संस्कृति की पवित्रता बनाए रखने के लिए, जर्मनी ने देश से सेमिटिक नस्लों – यानी यहूदियों – को निकालकर दुनिया को चौंका दिया। नस्ल पर गर्व का सबसे ऊँचा रूप यहाँ देखने को मिला है। जर्मनी ने यह भी दिखाया है कि जिन नस्लों और संस्कृतियों में बुनियादी तौर पर गहरे मतभेद हों, उनका एक साथ मिलकर एक मुकम्मल इकाई बनना लगभग नामुमकिन है ; यह हिंदुस्तान में हमारे लिए सीखने और फ़ायदा उठाने लायक एक अच्छा सबक है।' तो संघ के दूसरे सरसंघचालक (प्रमुख) ने हमें किससे सीखने को कहा था? हिटलर से। संघ वैचारिक तौर पर मुसोलिनी और हिटलर का अनुयायी है।
संघ के संस्थापकों में से एक, बी.एस. मुंजे ने मार्च 1931 में इटली में दस दिन बिताए थे। इस दौरान, 19 मार्च को उन्होंने रोम स्थित फ़ासिस्ट मुख्यालय का दौरा किया था और बेनिटो मुसोलिनी के साथ विस्तारपूर्वक चर्चा की थी। स्पष्ट प्रशंसा भाव के साथ, मुंजे ने 'नेशनल फ़ासिस्ट एकेडमी', 'मिलिट्री कॉलेज' और 'सेंट्रल मिलिट्री स्कूल' का भ्रमण किया, और साथ ही 'ब्लैकशर्ट्स' को सक्रिय रूप से कार्य करते हुए भी देखा। इसके बाद, उन्होंने यह घोषणा की कि भारत को — विशेष रूप से 'हिंदू भारत' को — हिंदुओं में सैन्य चेतना को पुनः जागृत करने के लिए इसी तरह के एक संगठन की आवश्यकता है। उस समय, मुंजे 'हिंदू महासभा' के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत थे, और बाद में वे संघ के प्रथम 'सरसंघचालक' (प्रमुख) हेडगेवार के एक प्रमुख राजनैतिक मार्गदर्शक बने।
भारत में ही स्थित अजंता और एलोरा की दीवारें इतिहास से भरी हुई हैं। प्राचीन कलाकारों ने असीम प्रेम और अथक प्रयासों से इन दीवारों पर कला के मूल पाठ उकेरे थे। इन गुफाओं की शानदार मूर्तियां जातक कथाओं को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से बयां करती हैं। इसी तरह, अफगानिस्तान के बामियान प्रांत में, बुद्ध की दो विशाल मूर्तियां – 115 फीट और 174 फीट ऊंची, और 1,500 साल पुरानी – कभी पहरेदार की तरह खड़ी थीं। मार्च 2001 में, तालिबान ने उन्हें तोड़कर मलबे में बदल दिया। यूनेस्को ने उन्हें बचाने की कोशिश की थी ; न्यूयॉर्क के म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट, थाईलैंड और श्रीलंका जैसे बौद्ध-बहुल देशों, और यहाँ तक कि ईरान ने भी इन मूर्तियों को अपने यहाँ ले जाने की पेशकश की थी। लेकिन सारे प्रयास व्यर्थ साबित हुए। और फिर भी, इतिहास, धर्म और कला उन पत्थरों की परतों में सोए हुए थे, जिन्हें धर्म के नाम पर तबाह कर दिया गया – पच्चीस दिनों से भी ज़्यादा समय तक, रॉकेट, टैंक और आखिर में डायनामाइट का इस्तेमाल करके ; और ये सभी चीज़ें विदेशी मूल की थीं! विडंबना यह है कि यहाँ मोदी 'स्वदेशी' का उपदेश देते हैं, लेकिन खुद इटैलियन चश्मा पहनते हैं, स्विस घड़ी लगाते हैं, अमेरिकी फ़ोन इस्तेमाल करते हैं, और जर्मन कार में सफर करते हैं – जो उस 'आत्मनिर्भरता' के बिल्कुल विपरीत है, जिसकी वकालत वह करते हैं।
ताजमहल — दुनिया के सात अजूबों में से एक है। क्या कोई यह दावा करता है कि यह आगरा का है, या उत्तर प्रदेश का? नहीं। हम सहज ही कहते हैं कि यह भारत का है। और पूरी दुनिया भी यही कहती है। ठीक वैसे ही, जैसे हम कहते हैं — ‘चीन की विशाल दीवार’, ‘मिस्र के पिरामिड’, ‘इटली का कोलोसियम’, ‘ब्राज़ील का क्राइस्ट द रिडीमर’, ‘चिली की ईस्टर आइलैंड की मूर्तियाँ’, या ‘जॉर्डन का पेट्रा’ — ये सभी प्रतीक अपने देशों की पहचान हैं, न कि केवल अपने शहरों या क्षेत्रों की।
*भाग तीन*
कुछ रचनाएँ, कला की कुछ कृतियाँ, एक ऐसी सार्वभौमिक गूँज रखती हैं, जो समय, भूगोल, राष्ट्र, नस्ल और भाषा की सीमाओं से परे होती है। फिर भी, दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी दमघोंटू दायरों में ही उनका गला दबा देना चाहते हैं।
अपनी फाँसी की पूर्व संध्या पर, भगत सिंह न तो गीता में डूबे हुए थे और न ही गुरु ग्रंथ साहिब में – बल्कि, वे लेनिन के विचारों में मग्न थे। क्या इससे भारत के प्रति उनका प्रेम कम हो गया? जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल असेंबली (आज की संसद) में एक ऐसा बम फेंका, जिससे किसी को कोई नुकसान न पहुँचे – जिसका मकसद था "बहरों को सुनाना" – तो उन्होंने साथ ही कुछ पर्चे भी बिखेरे, जिन पर "इंकलाब जिंदाबाद" (क्रांति अमर रहे) और "साम्राज्यवाद मुर्दाबाद" जैसे नारे लिखे थे। "वंदे मातरम" से "इंकलाब जिंदाबाद" की ओर यह बदलाव – क्या यह 'दक्षिण एशिया के चे ग्वेरा' को किसी भी तरह से कम देशभक्त साबित करता है?
दूसरी ओर, जुलाई 1908 में बाल गंगाधर तिलक को "राजद्रोह" के आरोप में छह साल की कैद की सज़ा सुनाई गई। इतिहासकार बिपन चंद्र लिखते हैं : इसके विरोध में, सभी सूती मिलों और रेलवे के मज़दूरों ने पूरी तरह हड़ताल कर दी, जिससे बंबई पूरी तरह ठप हो गया। सेना तैनात कर दी गई। सड़कों पर सोलह मज़दूर मारे गए, और पचास से ज़्यादा घायल हो गए। भारत में मज़दूरों की इस हड़ताल को देखते हुए, व्लादिमीर लेनिन ने अपने निबंध ‘विश्व राजनीति में ज्वलनशील सामग्री’ में लिखा : ‘भारत में भी, सर्वहारा वर्ग अब सचेत राजनीतिक जन-संघर्ष के स्तर तक पहुँच चुका है – और, अगर ऐसा है, तो भारत में रूसी-शैली का ब्रिटिश शासन अब खत्म होने वाला है!’
कार्ल मार्क्स : उनका जन्म जर्मनी के सबसे पुराने शहरों में से एक, ट्रियर में हुआ था, जो मोसेल नदी के किनारे बसा है। उनकी शिक्षा ट्रियर में हुई, फिर बॉन में, उसके बाद बर्लिन में, और फिर पेरिस में। इसके बाद ब्रसेल्स में। और अंत में, लंदन में। उन्हें किस जगह से जोड़ा जाए? ट्रियर से? बॉन से? पेरिस से? या लंदन से? क्या 'कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो' या 'दास कैपिटल' कभी भी भौगोलिक सीमाओं में बंधे रहे हैं?
मार्क्स ने भारत पर भी विस्तार से लिखा, फिर भी काफी लंबे समय तक दुनिया भर के मार्क्सवादी इन रचनाओं से काफी हद तक अनजान ही रहे। 1853 और 1861 के बीच, उन्होंने 'न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून' के लिए भारत और चीन पर लगातार कई निबंध लिखे। 'ट्रिब्यून' के इस दौर में, उन्होंने भारतीय अध्ययनों में खुद को पूरी तरह से डुबो दिया। अपने अंतिम दिनों में भी, वे बंगाल के ग्रामीण समाज के विवरणों में मग्न रहते थे — ग्रंथों पर टिप्पणियाँ लिखते थे और हाशिये में ऐसे नोट जोड़ते थे, जो भविष्य में चिंतन को प्रेरित कर सकें।
मार्क्सवाद क्या है? यह दुनिया को देखने का एक नज़रिया है, घटनाओं को समझने का एक ज़रिया है। जब इसे किसी खास देश पर लागू किया जाता है, तो यह उस देश के अनोखे इतिहास, संस्कृति, सामाजिक ताने-बाने और हालात का सहारा लेकर खास स्थितियों का विश्लेषण करता है। इसलिए, क्रांतिकारी मॉडल हर देश में अलग-अलग होते हैं। हमारी पार्टी, सीपीआई(एम) रूस या चीन की महज़ एक नकल नहीं है ; बल्कि, हमने उनके अनुभवों को आत्मसात किया है और उन्हें अपने संदर्भ के हिसाब से ढाला है, जिससे हमने अपना एक अलग रास्ता बनाया है।
मार्क्स के जन्म के बाद से पृथ्वी ने सूरज के चारों ओर 207 चक्कर पूरे कर लिए हैं। उनकी किताब 'कैपिटल' का पहला वॉल्यूम छपे हुए 157 साल हो चुके हैं ; यह किताब पूंजीवाद की उनकी एक विस्तृत आलोचना थी। फिर भी, उनकी और उनके काम की प्रासंगिकता आज भी ज़रा भी कम नहीं हुई है। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जोसेफ़ स्टिग्लिट्ज़ अब '1% और 99%' के बीच के अंतर की बात करते हैं। मार्क्स ने 1848 में ही इसी असमानता को सामने रखा था – दसवें हिस्से और नौ-दसवें हिस्से के बीच के गहरे फ़र्क को। जब मार्क्स का जन्म हुआ था, तब दुनिया ने रेलगाड़ी देखी भी नहीं थी ; रेडियो का तो कोई नामोनिशान ही नहीं था, और टेलीफ़ोन का आविष्कार भी उनकी मृत्यु से महज़ सात साल पहले ही हुआ था। आई-फोन के ज़माने में पहुंचने के बावजूद, उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। हो सकता है कि मार्क्स ने फेसबुक की कल्पना न की हो, लेकिन उनकी गहरी समझ ने ज़करबर्ग के बिज़नेस मॉडल को पहले ही अपने दायरे में ले लिया था।
यही वजह है कि 'द इकोनॉमिस्ट' – जो एक ऐसा प्रकाशन है, जिसे लेनिन ने कभी 'ब्रिटिश करोड़पतियों की आवाज़ उठाने वाला अख़बार' बताया था – ने मई 2018 में यह सलाह दी थी : "दुनिया के शासकों, कार्ल मार्क्स को पढ़ो!" 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' ने एक ऑप-एड (संपादकीय लेख) प्रकाशित किया, जिसमें यह घोषणा की गई थी : "जन्मदिन मुबारक, कार्ल मार्क्स। तुम सही थे!" ऑस्कर समारोह में, निर्देशक जूलिया राइचर्ट ने अपनी डॉक्यूमेंट्री 'अमेरिकन फ़ैक्ट्री' के लिए पुरस्कार स्वीकार करते समय दिए गए अपने भाषण का समापन, 'कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो' के उस जोशीले नारे के साथ किया : 'दुनिया के मज़दूरों, एक हो!' इसी बीच, 'द वॉशिंगटन पोस्ट' ने 'मार्क्स का साया आज भी दुनिया पर क्यों मंडरा रहा है' (8 मई, 2018) शीर्षक वाले एक लेख में खुले तौर पर यह स्वीकार किया : 'आप उनके बारे में चाहे जो भी सोचते हों, मार्क्स आज भी प्रासंगिक हैं।'
*भाग चार*
क्या रवींद्रनाथ केवल अविभाजित बंगाल से ही जुड़े हैं, या वे वैश्विक महत्व की हस्ती हैं? रवींद्रनाथ की रचनाओं का चीनी भाषा में सबसे पहले अनुवाद चेन दुक्सिऊ ने किया था, जो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक और उसके पहले महासचिव थे। चीनी पाठकों को टैगोर की रचनाओं से उनके नोबेल पुरस्कार की घोषणा से भी पहले ही परिचित करा दिया गया था। आज के दौर पर नज़र डालें, तो स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है : अब रवींद्र संगीत गाना राजद्रोह माना जाता है! ‘आमार शोनार बांग्ला’ गाना पूरी तरह से प्रतिबंधित है —इसे गाने वाले को ‘गद्दार’ करार दे दिया जाता है! अगर रवींद्रनाथ आज जीवित होते, तो शायद उन्हें जेल में डाल दिया जाता या फिर सीमा पार धकेल दिया जाता। यह कितनी हैरानी की बात है कि टैगोर दो अलग-अलग देशों में, दो अलग-अलग तरह के कट्टरपंथ का निशाना बन गए हैं!
यह बात ज़रा भी हैरानी की नहीं है। धुर-दक्षिणपंथी राजनीति का चरित्र एक जैसा ही, ज़ेनोफ़ोबिक (विदेशियों से नफ़रत करने वाला), होता है — यह एक ऐसी विशेषता है, जो पूरी दुनिया में एक समान रूप से दिखाई देती है। इसके बिल्कुल विपरीत, रवींद्रनाथ की देशभक्ति मानवता के प्रति उनके गहरे प्रेम में निहित थी ; इसमें अपने देश के लोगों के लिए एक सच्चा और सबको साथ लेकर चलने वाला स्नेह शामिल था — एक ऐसा स्नेह, जो तमाम विभाजनों और मतभेदों से ऊपर था। साथ ही, उनका यह प्रेम दुनिया भर के सभी लोगों तक फैला हुआ था, जो एक सार्वभौमिक सहानुभूति का प्रतीक था। इसी दोहरी प्रकृति ने उन्हें एक जोशीला देशभक्त और एक समर्पित अंतर्राष्ट्रीयतावादी — इन दोनों का एक सुमधुर मेल — बना दिया। उन्होंने अपनी रचना 'नैवेद्य' की कविता 'चित्तो जेथा भयशून्य' ("जहाँ मन भयमुक्त हो") में इस दृष्टिकोण को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है :
*जहाँ भय-मुक्त है मन और गर्व से ऊँचा सिर ;/ जहाँ ज्ञान मुक्त है ;/ जहाँ दुनिया नहीं बँटी है/संकीर्ण घरेलू दीवारों से टुकड़ों में...*
लेकिन धुर-दक्षिणपंथी ताकतें लगातार कलह और फूट डालकर ही फलती-फूलती रही हैं – वे समाज को तोड़ने के लिए जाति, धर्म और नस्ल की दरारों का फ़ायदा उठाती हैं। असल में, वे ही असली ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ (वह समूह जो चीज़ों को तोड़ता है) हैं ; क्योंकि ऐसी फूट को बढ़ावा देकर ही वे प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और जल, जंगल और ज़मीन की लूट के अपने असली एजेंडे से लोगों का ध्यान भटकाने में कामयाब हो पाते हैं – और साथ ही, वे आम जनता को पहचान की राजनीति पर आधारित आपसी झगड़ों में उलझाए रखते हैं।
संघ परिवार "भारतीय" होने की अवधारणा को अपने "हिंदुत्व" की परियोजना के नज़रिए से परिभाषित करता है, और इस पर एक कठोर और संकीर्ण परिभाषा थोपता है। इसके बिल्कुल विपरीत, बंगाली चिंतन परंपरा की पहचान आत्मसातकरण और समन्वय की एक सराहनीय प्रवृत्ति से होती है – जिसमें विविध संस्कृतियों और विचारों के साथ जुड़ने, उन्हें अपनाने और उन्हें एकीकृत करने की तत्परता होती है ; और यह सब करते हुए भी वह अपनी समृद्ध विरासत और ऐतिहासिक पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखती है। इसी मूल भावना को टैगोर ने अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया था, जिसे उन्होंने इस प्रकार कहा है :
*अब द्वार खुल गया है पश्चिम के लिए,/ और वे पुकारते हुए आ रहे हैं हाथों में उपहार लिए —/ वे देंगे और लेंगे, मिलेंगे और सबको एक साथ लाएँगे ;/ इस विशाल मानवता के सागर-तट से/ जो कि भारत है—/ किसी को भी लौटाया नहीं जाएगा खाली हाथ।*
दक्षिणपंथी लगातार एकरूपता का समर्थन करते हैं, और "एक राष्ट्र, एक भाषा ; एक राष्ट्र, एक कानून ; एक राष्ट्र, एक चुनाव" के एक ही तरह के नैरेटिव की वकालत करते हैं। फिर भी, पूर्वी भारत, पश्चिमी भारत, उत्तरी भारत, पूर्वोत्तर और दक्षिणी भारत की असलियत इस सोच को पूरी तरह से गलत साबित करती है – हर क्षेत्र में संस्कृतियों, भाषाओं, खान-पान की परंपराओं और पहनावे की एक अलग ही छटा देखने को मिलती है। इससे एक अहम सवाल उठता है : इन अलग-अलग पहचानों में से किसे 'भारतीय' होने का दर्जा मिलेगा? क्या यह मिज़ोरम है, या फिर गुजरात? क्या यह इसी विविधता में एकता ही नहीं है, जो भारत को सचमुच 'महान भारत' बनाती है? एकरूपता और समानता एक ही चीज़ नहीं हैं।
दूसरी ओर, वामपंथी विचारधारा समानता और निष्पक्षता की वकालत करती है ; यह विभिन्न समुदायों, भाषाओं और समूहों की अलग-अलग पहचानों को स्वीकार करती है और उनका सम्मान करती है — फिर चाहे वे जाति, धर्म, लिंग या नस्ल के आधार पर कितने ही अलग क्यों न हों। विविधता के इस विचार को नकारा नहीं जाना चाहिए। यह हमारा मूल तत्व है। हमारी सभ्यता ने हमेशा उन महान एकता को मूर्त रूप दिया है, जो सभी मतभेदों से परे है। 'अनेकता में एकता' की यही अवधारणा हमारी पहचान है। यह भूमि अविश्वसनीय रूप से विविध है ; इसने सदियों से हज़ारों जातियों, धर्मों, समुदायों, भाषाओं, संस्कृतियों, खान-पान और पहनावे को सह-अस्तित्व के एक असाधारण ताने-बाने में बड़ी बारीकी से एक साथ पिरोया है।
*आर्यन और गैर-आर्यन, द्रविड़ और चीनी,/ सीथियन, हूण, पठान और मुग़ल —/ सभी एक ही काया में घुल-मिलकर एकाकार हो गए हैं।*
यह विविधता ही हमारी सच्ची पहचान है। एक ऐसी पहचान, जिस पर हमें असीम गर्व है, और जिसने वैश्विक मंच पर भारत को एक अद्वितीय स्थान दिलाया है।
लेकिन, दक्षिणपंथी खेमा फूट डालना चाहता है, और उस विविधता को ही नकार देता है, जो हमारी पहचान है। एकता की आड़ में, यह एकरूपता की वकालत करता है ; कुछ खास समूहों को 'बाहरी' करार देता है, और ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर तथा मनगढ़ंत शिकायतें गढ़कर, उन्हें ही समाज की समस्याओं के लिए बलि का बकरा बनाता है। यह इस तरह के नैरेटिव्स (कहानियों) से गुस्सा भड़काता है : 'आपकी गरीबी, आपकी बेरोज़गारी, आपकी समस्याएं — ये पूंजीवादी नीतियों की नाकामी का नतीजा नहीं हैं, बल्कि उनकी मौजूदगी का नतीजा हैं।' यह लचीला 'वे' संदर्भ के हिसाब से बदलता रहता है — एक संदर्भ में ये अश्वेत लोग हो सकते हैं, दूसरे में मुसलमान, कहीं और हिंदू, कुछ कहानियों में प्रवासी, या फिर आरक्षण का लाभ उठाने वाले दलित — दक्षिणपंथी खेमा इस फूट डालने वाली रणनीति का इस्तेमाल हर जगह करता है।
असली टकराव यहीं है — वामपंथ और संघ की विचारधारा के बीच।
*(लेखक माकपा के पोलिट ब्यूरो सदस्य हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*
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